हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हिमाचल में कर्मचारियों के नियमितीकरण पर ब्रेक, वजह चौंकाएगी — जानें पूरा मामला

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 27 फरवरी 2025 को दिए गए एकल जज के फैसले के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है, जिसमें बिल बेसिस पर काम करने वाले वन विभाग के कर्मचारियों को नियमित करने के निर्देश दिए गए थे। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश दिया। खंडपीठ अब इस मुद्दे पर विचार करेगी कि कर्मचारियों ने साल में 240 दिन काम किया है या नहीं। राज्य सरकार ने कर्मचारियों के 240 दिनों के कार्य दिवसों की कमी का हवाला देते हुए इस फैसले को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी। सरकार का दावा है कि एकल पीठ ने तथ्यों और रिकॉर्ड की जांच किए बिना केवल पुराने फैसले राम सिंह केस के आधार पर आदेश पारित कर दिया। खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को सुनने के बाद अपील दायर करने में हुई 219 दिनों की देरी को माफ कर दिया। मामले की अगली सुनवाई अब 18 मई को होगी।

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता 2006 से वन विभाग में दिहाड़ीदार के रूप में कार्यरत थे, लेकिन बाद में उनका दर्जा बदलकर बिल बेसिस कर दिया गया। विभाग ने उन्हें नियमित करने से यह कहकर मना कर दिया था कि वे स्वीकृत पदों पर नहीं हैं और उनकी नियुक्ति बतौर दिहाड़ीदार केवल मौसमी कार्यों के लिए बिल के आधार पर की गई है। एकल जज ने उक्त याचिकाओं मे कहा है कि केवल बिल बेसिस शब्द के आधार पर कर्मचारियों को नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने विभाग को आदेश दिया था कि उनकी पूरी सेवा अवधि को ध्यान में रखते हुए नियमितीकरण पर विचार किया जाए।

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के मामले में कहा है कि एक ही अधिसूचना के तहत अधिगृहित भूमि के लिए सभी सह-स्वामियों को समान दर पर मुआवजा मिलना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कहा कि सुशासन की जिम्मेदारी है कि तकनीकी आधार पर किसी भी किसान या भूमि मालिक के साथ भेदभाव न किया जाए। हाईकोर्ट ने बिजली बोर्ड को आदेश दिया है कि वह काली राम के उत्तराधिकारियों को भी उसी दर (48,400 प्रति बीघा) पर मुआवजा और सभी वैधानिक लाभ प्रदान करे, जोकि उसके भाई के मामले में तय किए गए थे। अदालत ने इस प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा करने के निर्देश दिए हैं।

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि एक सह-स्वामी को बढ़ी हुई दर पर मुआवजा मिला है, तो दूसरे को उससे वंचित करना न्याय का गला घोंटने जैसा है।भूमि अधिग्रहण अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है। इसका उद्देश्य उन गरीब और सीधे-सादे ग्रामीणों को राहत देना है जिनकी भूमि उनकी मर्जी के बिना सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ली गई है। अदालत ने कहा कि जब मुआवजे की एक उचित दर न्यायिक रूप से निर्धारित हो जाती है, तो सरकार का यह कर्तव्य है कि वह सभी प्रभावितों को बिना किसी भेदभाव के उसका लाभ दे। यह मामला जिला शिमला के रामपुर बुशहर के गांव गानवी का है, जहां गानवी जलविद्युत परियोजना के लिए दो भाई बाहु राम और काली राम की पैतृक भूमि का अधिग्रहण किया गया था।

भूमि अधिग्रहण कलेक्टर (लैंड एक्विजिशन कलेक्टर) ने 1991 में दोनों को लगभग समान मुआवजा दिया था।एक भाई बाहु राम ने मुआवजे के खिलाफ अदालत में धारा 18 के तहत अपील की। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जिला अदालत रामपुर ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 88,000 प्रति बीघा कर दी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने संशोधित कर 48,400 प्रति बीघा तय किया। जबकि दुसरे भाई काली राम ने शुरुआत में कोई कानूनी चुनौती नहीं दी थी। बाद में उसके उत्तराधिकारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि उन्हें भी उनके चाचा बाहु राम के समान ही बढ़ा हुआ मुआवजा दिया जाए। हिमाचल प्रदेश बिजली बोर्ड ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने समय पर अपील (धारा 18 या 28-ए) दाखिल नहीं की थी, इसलिए अब वे बढ़े हुए मुआवजे के हकदार नहीं हैं।

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