पाकिस्तान पर शिकंजा; चंद्रा नदी का ब्यास, भागा का रावी में डाला जाएगा पानी, बनेंगी दो सुरंगें

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सिंधु जल संधि निलंबित करने के बाद पाकिस्तान को जाने वाली चंद्रभागा (चिनाब) नदी के पानी का रुख मोड़ने की प्रक्रिया केंद्र सरकार ने तेज कर दी है। अब हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति से निकलने वाली चंद्रभागा का पानी पाकिस्तान नहीं जा सकेगा। केंद्र ने चंद्रा नदी के पानी को ब्यास और भागा को रावी में मिलाने की कवायद शुरू कर दी है। इसके लिए दो अलग-अलग लिंक टनलों का निर्माण किया जाएगा।

यहां बनेंगी दो सुरंग

पहली टनल कोकसर से ब्यास नदी के लिए बनेगी और दूसरी लाहौल की पीर पंजाल पर्वतमाला के महू दर्रे (4,365 मीटर) को भेदकर रावी नदी से जोड़ी जाएगी। यह दर्रा चंबा जिले को लाहौल और पांगी घाटी से जोड़ता है। इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट को डीपीआर पहले ही तैयार हो चुकी है। बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट को धरालत पर उतारने के लिए पिछले ढाई से तीन वर्षों से केंद्र सरकार काम कर रही है। डीपीआर के बाद अब दोनों लिंक टनलों के निर्माण के लिए 15 दिन पहले टेंडर लगाए गए हैं। 2352 करोड़ की लागत से बनेंगी टनल

2352 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली लिंक टनलों का निर्माण एनएचपीसी को सौंपा गया है। टेंडर खुलते ही निर्माण कार्य शुरू होगा और अगले तीन साल के भीतर इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। जानकारों का मानना है कि आधुनिकता के इस दौर में नदियों को मोड़ना बड़ी चुनौती नहीं है बल्कि आसानी से इसे ब्यास एवं रावी नदी में मोड़ा जा सकता है। उधर, एनएचपीसी के कार्यपालक निदेशक संदीप बत्रा ने बताया कि केंद्र की यह परियोजना एनएचपीसी की निगरानी में बनेगी।चंद्रा चंद्रताल और भागा सूरजताल से निकलती है

जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति के कुंजम दर्रा से होकर जाने ट्रैक पर पड़ने वाली 14,000 फीट ऊंची चंद्रताल झील से निकलने वाली चंद्रा नदी को टनल से मोड़कर ब्यास में डाला जाएगा। भागा नदी का उद्गम सूरजताल है, जो तांदी में चंद्रा नदी में मिलने के बाद चंद्राभागा बनती है। ऐसे में चंद्रा को ब्यास और भागा को रावी में मिलाया जाएगा। इसके लिए अलग-अलग दो लिंक टनलों का निर्माण किया जाएगा।

संधि की त्रुटियों में सुधार कर रही सरकार

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य और बीबीएमबी के पूर्व अध्यक्ष डीके शर्मा ने बताया कि भारत सरकार 1960 में हुई सिंधु जल संधि की त्रुटियों में सुधार कर रही है। इस प्रक्रिया से ईस्टर्न रिवर पर प्रोजेक्ट बनाने में मदद मिलेगी। इससे भारत में पानी की कमी दूर होगी।

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