कुपोषण से जंग: गर्भधारण से पहले महिलाओं की होगी पोषण जांच, ऊना में चलेगा पायलट प्रोजेक्ट

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हिमाचल प्रदेश में मातृ एवं शिशु कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए अब गर्भधारण से पहले ही महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण पर ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार के सहयोग से ऊना जिले में वुमन एंड इन्फैंट्स इंटीग्रेटेड ग्रोथ स्टडी (विंग्स) मॉडल पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जा रहा है।

इसके तहत महिलाओं को गर्भधारण से पहले पोषण, एनीमिया, मानसिक स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी सेवाओं से जोड़ा जाएगा। ऊना में पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद इसे पूरे राज्य समेत देशभर में लागू किया जाएगा।विशेषज्ञों के अनुसार हिमाचल प्रदेश में बच्चों में कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश में पांच वर्ष से कम आयु के करीब 31 प्रतिशत बच्चे ठिगनापन (स्टंटिंग) से प्रभावित हैं। लगभग 26 प्रतिशत बच्चे कम वजन (अंडरवेट) और 17 प्रतिशत बच्चे लंबाई के अनुपात में कम वजन की समस्या से जूझ रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया कि बच्चों में कुपोषण के ये स्तर अब भी प्रदेश के लिए बड़ी चुनौती बने हैं। छह से 59 माह तक के 55 प्रतिशत से अधिक बच्चे एनीमिया से ग्रस्त हैं। महिलाओं में भी एनीमिया की दर 53 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई है।विशेषज्ञों के अनुसार, यदि महिलाओं के स्वास्थ्य, पोषण, एनीमिया और वजन की स्थिति में सुधार गर्भधारण से पहले किया जाए तो कम वजन वाले बच्चों के जन्म, शिशु मृत्यु और बच्चों में कुपोषण को काफी हद तक रोका जा सकता है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने इस प्रोजेक्ट के लिए हिमाचल को चुना गया है। यह प्रोजेक्ट ऊना जिले के पांच विकास खंडों में 36 माह तक चलेगा। इसमें आशा एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी मिलकर महिलाओं और बच्चों की नियमित निगरानी करेंगे

हिमाचल प्रदेश में मातृ एवं शिशु कुपोषण की चुनौती से निपटने के लिए अब गर्भधारण से पहले की अवस्था पर फोकस किया जाएगा। ऊना जिले में विंग्स मॉडल लागू किया जा रहा है। इसके तहत महिलाओं को गर्भधारण से पहले ही पोषण, एनीमिया, मानसिक स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी सेवाओं से जोड़ा जाएगा, ताकि बच्चों में जन्म से पहले ही कुपोषण के जोखिम को कम किया जा सके। -प्रदीप कुमार, निदेशक, एनएचएम

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