
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में दिव्यांगजनों के लिए स्वतंत्र राज्य आयोग का गठन न होने तथा दृष्टिबाधित श्रेणी के चतुर्थ श्रेणी पदों की भर्ती प्रक्रिया में स्पष्टता की कमी पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं विशेष रूप से सक्षम अधिकारिता (ईएसओएमएसए) निदेशक को नया और विस्तृत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। इस नए हलफनामे में स्पष्ट रूप से दर्शाना होगा कि दृष्टिबाधित श्रेणी से चतुर्थ श्रेणी के पदों को भरने के लिए अब तक क्या ठोस प्रगति हुई है तथा जारी विज्ञापनों का पूर्ण ब्योरा क्या है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामे से यह स्पष्ट हुआ है कि राज्य में स्वतंत्र दिव्यांगजन आयोग का गठन अभी तक नहीं किया गया है और यह प्रस्ताव राज्य सरकार के विचाराधीन है।
आयोग के न बनने के कारण इसके लिए अलग से ढांचा या समर्पित कर्मचारी तैनात नहीं किए जा सके हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने तर्क दिया कि 18 जून 2024 की अधिसूचना के तहत आयोग की शक्तियां निदेशक (ईएसओएमएसए)को सौंपा जाना वैधानिक रूप से सही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कार्य केवल स्वतंत्र दिव्यांगजन राज्य आयोग द्वारा ही निष्पादित किया जाना चाहिए। उन्होंने अदालत के समक्ष चतुर्थ श्रेणी के रिक्त पदों और विशेष रूप से दृष्टिबाधित व्यक्तियों की भर्ती का मुद्दा उठाया।
उन्होंने कहा कि 19 जून 2026 को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री की अध्यक्षता में ब्लाइंड पर्सन्स एसोसिएशन हिमाचल प्रदेश और नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड के प्रतिनिधियों के साथ पदों को भरने के संबंध में बैठक हुई थी। वहीं सरकार ने बताया कि विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से 172 पद भरे जा रहे हैं।इसके अलावा वर्ष 2025 का कोई मामला लंबित नहीं है और वर्ष 2026 का केवल एक मामला विचाराधीन है। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान हलफनामे में विज्ञापनों की तिथियों और पदों को भरने की अद्यतन स्थिति की पूरी जानकारी नहीं दी गई है।
चेक बाउंस : कंपनी को पक्षकार बनाए बिना निदेशक के खिलाफ शिकायत अमान्य
सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस के मामले में एक महिला के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि कंपनी को पक्षकार नहीं बनाया जाता है, तो निदेशक या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के खिलाफ शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और विजय बिश्नोई की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द किया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को कंपनी को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी एक कानूनी व्यक्ति है और बैंक में खाता रख सकती है। यदि चेक कंपनी के खाते से जारी किया गया है, तो अपराध कंपनी की ओर से किया जाता है। शीर्ष अदालत ने माना कि शिकायत में कंपनी को आरोपी के रूप में शामिल न करना एक घातक दोष था। इस दोष के कारण शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता था।
आरोपी के अधिवक्ता ने तर्क दिया था कि कंपनी को आरोपी बनाए बिना निदेशक के खिलाफ शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने कंपनी को स्वतः आरोपी बनाने का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया। इसलिए, शिकायत और उससे संबंधित सभी कार्रवाई रद्द की जाती हैं। इस मामले में शिकायत में आरोप था कि कंपनी पर शिकायतकर्ता के पांच लाख रुपये बकाया थे।
कंपनी की निदेशक और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता आरोपी ने पांच लाख रुपये का चेक जारी किया था। यह चेक भुगतानकर्ता की ओर से भुगतान रोका गया… टिप्पणी के साथ वापस आ गया था। शिकायतकर्ता ने आरोपी को मांग नोटिस भेजा, लेकिन भुगतान नहीं किया गया।
न्यायिक मजिस्ट्रेट ने शिकायत का संज्ञान लिया और आरोपी को तलब किया। आरोपी ने कार्रवाई रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उसने तर्क दिया कि चेक कंपनी के खाते से जारी हुआ था, इसलिए कंपनी को पक्षकार बनाए बिना शिकायत रद्द होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल के दौरान कंपनी को सीआरपीसी की धारा 319 के तहत आरोपी बनाया जा सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया।
हाईकोर्ट ने ड्राइंग टीचर भर्ती याचिका निपटाई, सरकार ने वापस ली रिक्विजिशन
हिमाचल प्रदेश में ड्राइंग टीचर के नियमित पदों को अनुबंध या नियमित आधार पर भरने से जुड़ी भर्ती अधिसूचना को लेकर दायर याचिका को हाईकोर्ट ने निष्प्रभावी मानते हुए निपटा दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा रिक्विजिशन वापस लिए जाने के बयान के बाद याचिका निष्प्रभावी घोषित कर दिया है। याचिकाकर्ता ने 7 मार्च 2026 की अधिसूचना और 7 मई 2026 की रिक्विजिशन को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल ने पीठ को सूचित किया कि स्कूल शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी 2 जुलाई 2026 के पत्र के अनुसार, 7 मई 2026 की रिक्विजिशन को वापस ले लिया गया है। यह रिक्विजिशन सचिव (शिक्षा) और निदेशक, सैनिक कल्याण बोर्ड (पूर्व सैनिक), हमीरपुर को भेजी गई थी।
अदालत परिसरों में दिव्यांगों के लिए सुविधाओं पर हलफनामा पेश
प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला एवं उप-मंडल स्तर के अदालत परिसरों को दिव्यांगजनों के लिए सुगम्य बनाने से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की पीठ के समक्ष हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से एक विस्तृत हलफनामा पेश किया गया। रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया गया कि उच्च न्यायालय स्तर पर रजिस्ट्री में एक्सेसिबिलिटी कमेटी पहले से ही कार्यरत है।
हालांकि, कोर्ट परिसरों में दिव्यांगों की सुगमता की जांच और निगरानी के लिए अभी तक किसी भी अधिकारी को एक्सेसिबिलिटी ऑडिटर के रूप में नामित नहीं किया गया है। हलफनामे में राज्य भर की अदालती इमारतों की वास्तविक स्थिति की जानकारी दी गई। बताया गया है केवल जिला स्तर ही नहीं, बल्कि उप-मंडल स्तर के अदालती परिसरों में भी दिव्यांगों के आवागमन की सुविधाओं की समीक्षा की गई है।
इस बात का पूरा ब्योरा पेश किया गया कि किन-किन अदालती परिसरों में दिव्यांगजनों के लिए लिफ्ट और रैंप की सुविधा उपलब्ध है और किन स्थानों पर ये अभी तक नहीं हैं।कई अदालती परिसरों में नए रैंप और लिफ्ट लगाने से जुड़े विभिन्न प्रस्तावों का उल्लेख भी हलफनामे में किया गया है। अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल के हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त निर्धारित की है।
दिव्यांग स्कूल भवन हीरानगर की कमियों पर सरकार से मांगा स्पष्टीकरण
प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला के हीरानगर स्थित एम.आर. होम, हॉस्टल और स्कूल भवन के निर्माण में दिव्यांग अनुकूल सुविधाओं के अभाव पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस संबंध में राज्य सरकार को अपने आगामी हलफनामे में स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा नियुक्त न्यायमित्र ने बताया कि हीरानगर (शिमला) में दिव्यांगजनों के लिए बनाए जा रहे एम.आर. होम, हॉस्टल और स्कूल भवन में कई गंभीर संरचनात्मक खामियां हैं।
भवन में दिव्यांगजनों की आवाजाही के लिए आवश्यक रैंप और हैंडरेल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं बनाई गई हैं। इन सुविधाओं के न होने से यह इमारत दिव्यांग व्यक्तियों के उपयोग के लायक नहीं रह गई है। न्यायमित्र ने तर्क दिया कि यदि इमारत ही दिव्यांगों के लिए सुगम नहीं होगी, तो इसके निर्माण का पूरा उद्देश्य ही निष्फल हो जाता है। खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपने अगले हलफनामे में हीरानगर (शिमला) स्थित इस हॉस्टल और स्कूल भवन में पाई गई कमियों और उन्हें दुरुस्त करने के लिए उठाए जा रहे कदमों का पूरा विवरण पेश करे। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को होगी।
