
उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग शिमला ने शिमला जल प्रबंधन निगम लिमिटेड (एसजेपीएनएल) की ओर से जारी किए 2,56,670 रुपये के भारी-भरकम पानी के बिल को रद्द करने के आदेश दिए हैं। साथ ही उपभोक्ता को मानसिक प्रताड़ना देने और पानी का कनेक्शन काटने के लिए निगम पर 30,000 रुपये का जुर्माना लगाया है।
आयोग के अध्यक्ष डॉ. बलदेव सिंह और सदस्य निधि शर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए एसजेपीएनएल की इस कार्रवाई को सेवाओं में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार करार दिया है। छोटा शिमला के कालरा एस्टेट निवासी इंद्रजीत कालरा ने आयोग में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत के अनुसार उनके घर में पानी का घरेलू कनेक्शन है जहां परिवार में केवल 3-4 सदस्य रहते हैं।
साल 2019 तक उनका पानी का बिल औसतन 435 रुपये से 450 रुपये प्रति माह आता था। इसके बाद निगम ने अचानक हजारों रुपये के बिल भेजने शुरू कर दिए थे। हालत यह हो गई कि चार महीनों का बिल 35,535 रुपये और एक-एक महीने का बिल 10,476 रुपये और 12,175 रुपये तक आने लगा। उपभोक्ता द्वारा बार-बार लिखित शिकायत करने के बावजूद निगम ने कोई सुध नहीं ली और बकाया 2,56,670 रुपये दर्शाते हुए उनका पानी का कनेक्शन ही काट दिया।
कोर्ट ने कहा कि पानी जीवन की मूलभूत आवश्यकता है और गलत बिलिंग के आधार पर किसी का कनेक्शन काटना पूरी तरह गलत है।आयोग ने एसजेपीएनएल को निर्देश दिए हैं कि वर्ष 2019 से पहले की औसत खपत के आधार पर उपभोक्ता का नया संशोधित बिल जारी किया जाए। कटे हुए पानी के कनेक्शन को तुरंत बहाल किया जाए। निगम संशोधित बिल बनने तक उपभोक्ता से पुराने किसी भी बकाया की वसूली के लिए दबाव नहीं बना सकता। वहीं दूसरी तरफ शहर के लोगों ने अदालत के इस फैसले की सराहना की है।
समिति के खिलाफ दायर अपील खारिज
आईजीएमसी परिसर में जूस दुकान पर कब्जा जमाए रखने की कोशिश कर रहे संचालक को अदालत से बड़ा झटका दिया है। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश सीबीआई कोर्ट शिमला डॉ. परविंदर सिंह अरोड़ा की अदालत ने इस मामले में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए अपीलकर्ता की रोगी कल्याण समिति के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी दुकान खाली न करने से सरकारी खजाने को वित्तीय नुकसान हो रहा है।
अपीलकर्ता अनिल कुमार शर्मा निवासी लक्कड़ बाजार को साल 1996 में आईजीएमसी परिसर में एक छोटी दुकान आवंटित की गई थी। बाद में पार्किंग निर्माण के चलते उन्हें 2013 में 10 वर्ष लीज पर प्रिंसिपल ऑफिस के पास एक वैकल्पिक दुकान आवंटित की जिसका किराया 3000 रुपये प्रति माह तय हुआ था। इस लीज को बाद में 31 जुलाई 2024 तक के लिए बढ़ाया था। इसके बाद रोगी कल्याण समिति ने इस दुकान के लिए नए सिरे से ई-टेंडर आमंत्रित किए थे। इस टेंडर प्रक्रिया में यह दुकान राम लाल नामक व्यक्ति को 84,745 रुपये प्रति माह के उच्चतम किराये पर आवंटित की थी। समिति ने अनिल कुमार शर्मा को दुकान खाली करने के नोटिस जारी किए थे।
चिट्टा तस्करी के दोषी को 18 माह का कठोर कारावास
राजधानी की विशेष अदालत ने मादक पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। विशेष सत्र न्यायाधीश शिमला डॉ. परविंद्र सिंह अरोड़ा की अदालत ने चिट्टा (हेरोइन) तस्करी के दोषी को 18 महीने के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। कोर्ट ने दोषी पर 15,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अभियोजन पक्ष के अनुसार यह मामला 27 मई 2020 का है जब देश में कोविड-19 के कारण लॉकडाउन और प्रतिबंध लागू थे। एसआईयू की टीम संकट मोचन, तारादेवी और शोघी क्षेत्र में गश्त तथा ट्रैफिक चेकिंग पर थी।
शाम करीब 6.30 बजे ममलीग की तरफ से आ रही एक टैक्सी को चेकिंग के लिए रोका गया। टैक्सी में चालक के अलावा दो युवक सवार थे जो संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। इस दौरान पिछली सीट पर बैठे रोहड़ू निवासी दोषी पीयूष के पैरों के नीचे से पॉलीथिन पाउच मिले जिसमें 9.138 ग्राम चिट्टा बरामद हुआ था।
कोर्ट में एसजेपीएनएल ने दी मीटर ठीक होने की दलील
एसजेपीएनएल के वकील ने दलील दी कि उपभोक्ता का मीटर लैब में टेस्ट किया था और वह बिल्कुल ठीक पाया गया था इसलिए बिल वास्तविक खपत के आधार पर भेजे गए थे। आयोग ने निगम के दावों को खारिज करते हुए कहा कि अगर मीटर ठीक था तो निगम ने न तो उपभोक्ता को टेस्टिंग के समय शामिल किया और न ही कोर्ट में वह लैब रिपोर्ट पेश की। सबूत छिपाने के लिए आयोग ने निगम के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है।
एमसी के बिजली-पानी काटने के आदेश पर रोक
अदालत ने नगर निगम के उस आदेश के क्रियान्वयन और संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें एक परिसर का व्यावसायिक उपयोग करने का आरोप लगाते हुए उसके बिजली और पानी के कनेक्शन काटने के निर्देश दिए थे। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-1 शिमला प्रवीण गर्ग की अदालत ने मामले की सुनवाई तक इस आदेश पर स्टे लगा दिया है।
अदालत ने आदेश में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं जीवन के अधिकार का एक अनिवार्य हिस्सा है। किसी भी प्रभावित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना और कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें इन सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि नगर निगम ने यह विवादित आदेश 5 अक्तूबर 2024 को पारित किया था लेकिन इसे अपीलकर्ता को करीब डेढ़ साल की लंबी देरी के बाद 4 जून 2026 को भेजा गया। अदालत ने कहा कि नगर निगम का यह आदेश एकतरफा पारित किया था। कानून के मुताबिक एकतरफा कार्रवाई सही थी या नहीं इसका फैसला नगर निगम के रिकॉर्ड की जांच के बाद किया जा सकेगा।
प्रोमिला शर्मा ने अदालत में नगर निगम शिमला के आयुक्त के आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी। नगर निगम ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि महिला आवासीय परिसर में दुकान चला रही है और उसने इसका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू कर दिया है। इसके बाद निगम ने बिजली बोर्ड और एसजेपीएनएल को परिसर के बिजली-पानी के कनेक्शन काटने के निर्देश जारी किए थे।
अपीलकर्ता महिला ने दलील दी कि उन्होंने भवन का उपयोग आवासीय से व्यावसायिक में नहीं बदला है। इस परिसर को वर्ष 2009 में खरीदने के बाद से ही गोदाम के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह क्षेत्र उस समय नगर निगम की सीमा में शामिल नहीं था इसलिए निगम को ऐसा आदेश पारित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अगली सुनवाई 13 जुलाई को तय की है।
