
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में मंगलवार को आउटसोर्स भर्ती मामले में सुनवाई हुई। सरकार की ओर से कोर्ट से आग्रह किया गया कि असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती पर लगी रोक हटाई जाए या फिर पहले घोषित रिजल्ट के अनुसार चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी करने की अनुमति दी जाए। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सरकार की मांग को ठुकराते हुए कहा कि प्रदेश में आउटसोर्स के तहत कितनी नियुक्तियां की गई हैं, पहले उसका डाटा दो सप्ताह में पेश किया जाए। खंडपीठ ने सरकार की नई नीति पर भी सवाल उठाया और इसे युवाओं से खिलवाड़ और शोषण पर आधारित बताया।
अदालत में सरकार की ओर से हलफनामा दायर बताया गया कि असिस्टेंट स्टाफ नर्सिंग की भर्ती प्रक्रिया को और पारदर्शिता बनाने के लिए एक नीति बनाई है। नीति में बताया गया कि नियुक्तियां सिर्फ 5 साल के लिए की जाएंगी, लेकिन भविष्य में अपनी सेवाओं को वरिष्ठता और अन्य वित्तीय लाभों के लिए गणना की मांग नहीं कर सकेंगे। 25 हजार रुपये फिक्स मासिक पर रखा जाएगा। खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार पिछले तीन वर्षों में आउटसोर्स पर की गई नियुक्तियों का रिकॉर्ड पेश नहीं कर पाई। सरकार ने कोर्ट से गुहार लगाई कि इस मामले में डाटा रिकॉर्ड में लाने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाए, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। सुनवाई के दौरान प्रधान सचिव स्वास्थ्य एम सुधा और प्रधान सचिव वित्त देवेश कुमार सहित कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे
याचिकाकर्ताओं ने पॉलिसी पर उठाया सवाल
सरकार ने असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की पॉलिसी की रूपरेखा अदालत के समक्ष पेश की, जिस पर याचिकाकर्ताओं ने कड़ी आपत्तियां जताईं। उन्होंने कहा कि सरकार स्टाफ नर्सों के खाली पदों को भरने के बजाय एक नई नीति ला रही है। इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है बल्कि चयनित स्टाफ नर्सों के भविष्य के साथ भी भेदभाव होगा। सरकार को रिक्त पद भरने के लिए स्थायी बंदोबस्त करना चाहिए। पिछली सुनवाई में अदालत ने पाया था कि सरकार ने भर्ती नियमों में संशोधन किए बिना ही 6 नवंबर 2025 को एक नई नीति अधिसूचित कर दी और असिस्टेंट स्टाफ नर्स नामक एक नया काडर बनाकर 900 पद भरने की मंजूरी दे दी। मामले में अगली सुनवाई होगी।Himachal: असिस्टेंट स्टाफ नर्सों की भर्ती पर लगी रोक हटाने से हाईकोर्ट का इन्कार, नई नीति पर भी उठाया सवाल शिमला
