
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार किसी पद के लिए विज्ञापित अनिवार्य योग्यता पूरी नहीं करता है तो उसके पास उच्च योग्यता होने के आधार पर भी उस पद पर नियुक्ति पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भर्ती नियमों और विज्ञापन में मांगी गई योग्यता को बदला नहीं जा सकता। हाईकोर्ट ने पाया कि चूंकि याचिकाकर्ता विज्ञापन और भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के अनुसार अनिवार्य योग्यता पूरी नहीं करता थाष इसलिए चयन आयोग की ओर से उसकी उम्मीदवारी को रद्द करने का फैसला पूरी तरह से सही था। इसी के साथ अदालत ने इस याचिका को बिना किसी राहत के खारिज कर दिया।
अदालत ने याचिकाकर्ता के तर्कों को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कोई ठोस दस्तावेज या सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई ,है जो यह साबित करे कि याचिकाकर्ता का 3 साल का डिप्लोमा एक सामान्य स्नातक डिग्री के समकक्ष है। भले ही याचिकाकर्ता के पास टूरिज्म मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हो, लेकिन विज्ञापन में इस योग्यता की मांग नहीं की गई थी।
नियोक्ता को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि उसे किस पद के लिए किस तरह के उम्मीदवार की आवश्यकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि उम्मीदवार को लिखित परीक्षा में बैठने की अनुमति मिल गई थी और उसने अधिक अंक प्राप्त किए, वह भर्ती नियमों में छूट का दावा नहीं कर सकता।
राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में यह सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र है कि कुछ पद केवल बुनियादी योग्यता वाले लोगों के लिए ही आरक्षित रहें, जिससे उच्च योग्यता वाले उम्मीदवारों के कारण कम पढ़े-लिखे लोगों के रोजगार के अवसर न छिनें।उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश कर्मचारी चयन आयोग हमीरपुर ने वर्ष 2016 में पर्यटन और नागरिक उड्डयन विभाग में अनुबंध के आधार पर इंस्पेक्टर (होटल) के पदों के लिए आवेदन मांगे थे।
विज्ञापन के अनुसार इस पद के लिए अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक के साथ होटल मैनेजमेंट में डिप्लोमा अथवा किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से टूरिज्म एडमिनिस्ट्रेशन में बैचलर डिग्री रखा गया था।
याचिकाकर्ता संदीप कौशल ने अनुसूचित जाति श्रेणी में इस पद के लिए आवेदन किया था। लिखित परीक्षा में अपनी श्रेणी में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए। हालांकि, दस्तावेज सत्यापन के दौरान उनका चयन रद्द कर दिया गया, क्योंकि उनके पास साधारण स्नातक की डिग्री नहीं थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उनके पास मास्टर डिग्री है।
तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने नेशनल काउंसिल फॉर होटल मैनेजमेंट से 3 साल का डिप्लोमा किया है, जो स्नातक के समकक्ष है। इसके अलावा उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से मास्टर इन टूरिज्म मैनेजमेंट की उच्च डिग्री भी हासिल की है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि चूंकि उनके पास उच्च योग्यता है और उन्होंने परीक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए हैं, इसलिए उनका चयन रद्द करना पूरी तरह से गलत है।
तीन हफ्ते में दें पूरा बकाया
प्रदेश हाईकोर्ट के सख्त रुख और चेतावनी के बाद सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग में अनुबंध सेवा के नियमितीकरण के बाद बकाया राशि का भुगतान वास्तविक आधार पर करने और इसके लिए बजट आवंटित करने की बात स्वीकार कर ली है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने सुनवाई करते हुए अवमानना कारर्वाई को बंद कर दिया है। विभाग को तीन सप्ताह के भीतर सभी बकाया राशि याचिकाकर्ताओं के खातों में जारी करने का आदेश दिया है। इसे पहले 19 जून को हुई सुनवाई में कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास विभाग के निदेशक के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने पाया था कि मुख्य फैसले में याचिकाकर्ताओं को 2 मई 2019 से उनके समकक्षों के समान सभी परिणामी लाभों के साथ संविदा सेवा को नियमित करने का आदेश दिया गया था।
इसके बावजूद निदेशक ने एक कार्यालय आदेश जारी कर वास्तविक लाभ के बजाय काल्पनिक लाभ और किस्तों में भुगतान करने का मनमाना प्रयास किया। सरकार की ओर से अदालत को सूचित किया गया कि याचिकाकर्ताओं के वेतन का पुनर्गठन कर दिया गया है। पहले गणना की गई 10,35,357 की राशि और वित्तीय मांग के आधार पर वित्त विभाग ने 8 जुलाई 2026 को आवश्यक बजट आवंटित कर दिया है। यह बजट संबंधित बाल विकास परियोजना अधिकारियों को भी ट्रांसफर कर दिया गया है। अदालत ने प्रतिवादियों (सरकार/विभाग) को निर्देश दिया है कि वे आज से तीन सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं को फैसले के तहत देय और स्वीकार्य भुगतान सुनिश्चित करें। याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी है कि यदि उनकी कोई शिकायत अभी भी अधूरी रह जाती है, तो वे कानून के अनुसार दोबारा उचित कानूनी उपाय तलाश सकते हैं।
