
हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का पर्व इस वर्ष 25 जुलाई, शनिवार को मनाया जाएगा। इस पवित्र तिथि के साथ ही सनातन धर्म में विशेष महत्व रखने वाले चातुर्मास का शुभारंभ भी होगा, जो लगभग चार माह तक चलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं, और सृष्टि के संचालन का भार भगवान शिव संभालते हैं।
देवशयनी एकादशी: तिथि, मुहूर्त और व्रत का विधान
एकादशी तिथि 24 जुलाई को सुबह 9:12 बजे से प्रारंभ होकर 25 जुलाई 2026 को पूर्वाह्न 11:34 बजे तक मान्य रहेगी। व्रत का पारण 26 जुलाई, रविवार को सुबह 7:18 बजे से 9:00 बजे के बीच किया जाएगा। देवशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर मनुष्य के जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश होता है। यह व्रत मोक्ष, दीर्घायु, सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करने वाला माना गया है।
राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी उमेश नौटियाल के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने बताया कि इस दिन सुबह स्नान कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत और नैवेद्य अर्पित करने का विधान है। श्रद्धापूर्वक “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और “ॐ नमः शिवाय” मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभकारी होता है।
चातुर्मास: संयम, साधना और दान का काल
देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक मास तक चलने वाले चातुर्मास को आत्मसंयम, भक्ति, तप, जप और दान का श्रेष्ठ काल माना जाता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों को स्थगित कर दिया जाता है, क्योंकि इस दौरान भगवान विष्णु की अनुपस्थिति मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास में सात्त्विक जीवन अपनाने तथा धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस चार माह की अवधि में संयम, साधना, सत्संग, सेवा और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। यह समय स्वयं को ईश्वर भक्ति में लीन करने और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
