कागजों में दौड़ती योजनाएं, जमीन पर ठप—हिमाचल में आखिर चल क्या रहा है?

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हिमाचल प्रदेश में पिछले तीन वर्षों के दौरान बजट की कई घोषणाओं पर जहां काम शुरू नहीं हुआ है, वहीं कई योजनाएं अधर में लटकी हैं। उद्घाटन के बाद भी कई योजनाओं पर काम शुरू नहीं हो सका है। हेलीपोर्ट, डे-बोर्डिंग स्कूल और खेलों से जुड़ी कई योजनाएं दो से तीन वर्षों से लटकी हैं। प्रदेश सरकार का कहना है कि केंद्र की बंदिशों के बावजूद बजट की घोषणाओं पर काम किया जा रहा है।

वित्तीय दबाव, भूमि और वन स्वीकृतियों में देरी और योजनाओं की बड़ी संख्या के कारण प्रदेश में पहले बजट घोषणाओं का पूरा क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। हर साल नई योजनाएं घोषित तो होती गईं, लेकिन पिछली योजनाओं का काम पूरा नहीं हो सका। वर्ष 2023 से 2025 तक की बजट घोषणाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यटन, खेल और बुनियादी ढांचे से जुड़ीं कई योजनाएं घोषित हुईं, लेकिन बड़ी संख्या में ये अब तक पूरी नहीं हो सकी हैं। प्रदेश में पर्यटन और आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए कई हेलीपोर्ट बनाने की घोषणा हुई, लेकिन अधिकांश जगह इनका काम लटका है। नाहन के धारक्यारी में हेलीपोर्ट का काम जारी है, जबकि कुल्लू-मनाली क्षेत्र में हेलीपोर्ट परियोजना वन स्वीकृति के कारण अटकी है।

ऊना के जनकौर में हेलीपोर्ट का सर्वे पूरा हो चुका है, लेकिन प्रशासनिक मंजूरी लंबित है। बिलासपुर और हमीरपुर में भी हेलीपोर्ट निर्माण अधूरा है। चंबा के सुल्तानपुर हेलीपोर्ट का करीब 40 फीसदी कार्य ही पूरा हुआ है। रामपुर के दत्तनगर में खेल छात्रावास और इंडोर स्टेडियम उद्घाटन के बाद भी शुरू नहीं हो सके। कालाअंब में 220 केवी सब स्टेशन की योजना वर्षों से लंबित है। नालागढ़ मेडिकल डिवाइस पार्क का काम अधूरा है और वहां प्रस्तावित महिला छात्रावास भी नहीं बन पाया।

साल 2023 के बजट में घोषित राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूल योजना विभिन्न जिलों में धरातल पर नहीं उतर पाई है। तीन साल बाद भी अधिकांश जिलों में इसके भवन तैयार नहीं हो पाए हैं। कई जिलों में भूमि चयन और प्रशासनिक मंजूरी की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हो सकी है। कुछ स्थानों पर निर्माण कार्य शुरू हुआ है, लेकिन योजना राज्य स्तर पर अभी अधूरी है। पूर्व सरकार के समय घोषित अटल आदर्श विद्यालय भी अब फाइलों में गुम हो गए हैं। जिन दो-तीन स्कूलों पर काम हो रहा है, उनकी रफ्तार धीमी है।

शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर का कहना है कि बजट घोषणाओं को पांच साल में पूरा करना होता है। शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव देखने को मिल रहे हैं। केंद्र की आर्थिक बंदिशों के बावजूद अपने संसाधनों से सरकार विकास को प्राथमिकता दे रही है। दो साल में लंबित घोषणाएं पूरी होंगी।

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