युद्ध का असर अब घर तक! होम केयर प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग क्यों हुई कम?

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बीबीएन में होम केयर प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों में 35 से 40 फीसदी उत्पादन कम हो गया है। कच्चा माल न मिलने के कारण सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, वहीं लेबर की कमी व पैकिंग मैटीरियल के रेट बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ गई है। क्रूड आयल को लेकर स्थिति सामान्य नहीं होती है तो आने वाले समय में ये उद्योग बंद भी हो सकते हैं। खाड़ी युद्ध के चलते इन उद्योगों में कच्चे माल की समस्या पैदा हो गई है। दिहाड़ी भी 800 रुपये मांग रहे हैं। पहले 500 रुपये में मजदूर आसानी से मिल जाते थे। बीबीएन में 32 उद्योग होम क्लीन प्रोडक्ट तैयार करते हैं। बर्तनों को साफ करने वाला कच्चा माल लेबसा के रेट तीन गुना बढ़ने के बाद भी उद्योगपतियों को यह सामान नहीं मिल रहा है।

पहले इसके रेट 120 रुपये प्रति किलो थे, जो अब बढ़कर 295 रुपये प्रति किलो हो गए हैं। जमाखोरी बढ़ गई है और छोटे उद्योग चलाना कठिन हो गया है। होम केयर प्रोडक्ट में कई प्रकार के परफ्यूम डलते हैं, जिसके रेट दोगुना हो गए हैं। पहले 900 रुपये किलो परफ्यूम मिल जाता था, लेकिन अब 1800 रुपये प्रति किलो हो गया है। एसएलईएस प्रोडक्ट बेस के लिए प्रयोग होता है। इसके रेट भी दोगुना हो गए हैं। पहले यह 65 रुपये किलो था अब 125 रुपये किलो मिल रहा है। रेट अधिक होने के बावजूद भी उद्योगपतियों को आसानी से व समय पर यह उत्पाद नहीं मिल रहे हैं।

लघु उद्योग भारती के प्रदेश कोषाध्यक्ष अजय सिंह चौहान, लघु उद्यमी डॉ. हेमंत कौशल, संजीव सिंह, हंसा नंद झा ने बताया कि खाड़ी युद्ध के चलते सेनेटरी का सामान तैयार करने वाले उद्योगों में कच्चे माल का संकट पैदा हो गया है। कच्चे माल के लिए पैसा दोना देने के बाद भी सामान नहीं मिल रही है। 35 से 40 फीसदी होम केयर प्रोडक्ट बनाने वाले उद्योगों में काम बंद हो गया है। अगर यही हालत रहे तो कई उद्योग बंद हो जाएंगे। पैकिंग मेटीरियल के रेट भी 25 फीसदी तक बढ़ गए हैं। प्लास्टिक दाना न मिलने से प्लास्टिक की बोतले महंगी हो गई हैं। 

लेबर की किल्लत सबसे ज्यादा
हिमाचल प्रदेश चैंबर ऑफ कॉमर्स पांवटा साहिब के मुख्य सलाहकार देवव्रत यादव ने बताया कि सबसे ज्यादा उद्योगों में लेबर की किल्लत हो गई है। एलपीजी न मिलने से लोग यहां से अपने गांव की ओर पलायन कर गए हैं। ठेकेदार को लेबर लेने के लिए पहले एलपीजी सिलिंडर की मांग करते है। दिहाड़ी भी 800 रुपये मांग रहे हैं। पहले 500 रुपये में मजदूर आसानी से मिल जाते थे। आने वाले समय में उद्योगों से तैयार माल के दाम भी आसमान छू जाएंगे। 

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