
हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में खुशी की लहर दौड़ गई है, क्योंकि यहां के पारंपरिक और औषधीय गुणों से भरपूर सीबकथोर्न, जिसे स्थानीय भाषा में ‘छरमा’ कहा जाता है, को प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त हुआ है। इस महत्वपूर्ण पहचान से न केवल छरमा की मौलिकता और गुणवत्ता को कानूनी संरक्षण मिलेगा, बल्कि इसके तैयार उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद जगी है।
जीआई टैग से उत्पादकों को लाभ: जीआई टैग मिलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह छरमा और इससे बनने वाले उत्पादों, जैसे जूस, जैम, हर्बल उत्पाद आदि की प्रामाणिकता सुनिश्चित करेगा। इससे इनके बाजार में मांग बढ़ने की संभावना है। साथ ही, यह नकली उत्पादों के प्रसार पर रोक लगाने में भी सहायक होगा, जिससे क्षेत्रीय उत्पादकों के अधिकारों की सुरक्षा होगी और उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिल सकेगा।
आजीविका का महत्वपूर्ण साधन: लाहौल-स्पीति जिले में लगभग 1,500 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से सीबकथोर्न के पौधे पाए जाते हैं। इनके संग्रहण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की प्रक्रिया में 2,000 से अधिक जनजातीय महिलाएं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं। स्थानीय महिलाओं का मानना है कि जीआई टैग मिलने से उनके द्वारा उत्पादित छरमा उत्पादों को बेहतर बाजार मिलेगा और उनकी आय में वृद्धि होगी।
रोजगार और स्वरोजगार के अवसर: स्थानीय स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए छरमा केवल एक पौधा नहीं, बल्कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इस नई पहचान से क्षेत्र के युवाओं और महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर ही रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यह उम्मीद जताई जा रही है कि जीआई टैग लाहौल के इस अनमोल पारंपरिक उत्पाद को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाएगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
