
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने तेजाब हमले के दो दोषियों के उस आवेदन को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी 10 साल की जेल की सजा को निलंबित कर जमानत पर रिहा करने की मांग की थी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 326-ए के तहत आने वाला अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। यह किसी महिला की शारीरिक अखंडता और उसके सम्मान को पूरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे गंभीर मामलों में सजा को निलंबित करने के लिए बेहद सख्त मानकों का पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषियों को कोई भी राहत देने से साफ इन्कार कर दिया।
यह मामला वर्ष 2017 में कांगड़ा जिले के जवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। वक्फ ट्रिब्यूनल-कम-सत्र न्यायाधीश धर्मशाला ने 29 नवंबर 2025 को दोनों आरोपियों रेणुका और मोहिंदर सिंह को दोषी ठहराया था। उन पर आईपीसी की धारा 326-ए एसिड अटैक के लिए 10 साल का कारावास और 50 हजार जुर्माना लगाया गया है। दोषियों के वकील ने दलील दी थी कि एफआईआर दर्ज होने में देरी हुई और गवाहों के बयानों में विरोधाभास है।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत से दोषी ठहराए जाने के बाद आरोपी की निर्दोष होने की धारणा खत्म हो जाती है।एक विचाराधीन कैदी को जमानत देने और सजा पा चुके दोषी की सजा निलंबित करने के पैरामीटर पूरी तरह अलग होते हैं। कम समय की सजा में निलंबन सामान्य नियम हो सकता है, लेकिन एसिड अटैक जैसे जघन्य और गंभीर अपराधों में जेल की सजा को निलंबित न करना ही नियम है। अदालत ने यह भी नोट किया कि दोषियों को नवंबर 2025 में ही सजा सुनाई गई थी। उन्हें 10 साल की कैद मिली है, जिसमें से उन्होंने अभी तक केवल 7 से 8 महीने का समय ही जेल में काटा है। अपराध की भयावहता और इतनी कम अवधि की सजा काटने के आधार पर उन्हें जमानत पर छोड़ना न्यायसंगत नहीं है। इस मामले में मुख्य अपील अभी लंबित है।
