
हिमाचल प्रदेश की जीवनरेखा मानी जाने वाली ब्यास नदी का हेल्थ ऑडिट होने जा रहा है। विश्व बैंक वित्तपोषित हिमाचल प्रदेश पावर सेक्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत राज्य सरकार ने ब्यास नदी बेसिन का व्यापक संचयी प्रभाव आकलन करवाने का निर्णय लिया है। करीब 1.44 करोड़ रुपये की लागत से होने वाला यह अध्ययन अगले 70 सप्ताह में पूरा किया जाएगा। इसके निष्कर्ष भविष्य में ब्यास नदी पर होने वाले जलविद्युत विकास की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
ब्यास नदी और इसकी सहायक धाराओं पर अनेक जलविद्युत परियोजनाएं विकसित हुईं
पिछले दो दशक में ब्यास नदी और इसकी सहायक धाराओं पर अनेक जलविद्युत परियोजनाएं विकसित हुई हैं। अब पहली बार पूरे नदी बेसिन को एक इकाई मानकर यह जांच होगी कि इन परियोजनाओं का नदी, पर्यावरण, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों पर संयुक्त रूप से कितना प्रभाव पड़ा है। भविष्य में इसका क्या असर हो सकता है। अभी तक अधिकांश परियोजनाओं का पर्यावरणीय मूल्यांकन अलग-अलग किया जाता रहा है, लेकिन यह अध्ययन ब्यास नदी को एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखते हुए उसके संपूर्ण स्वास्थ्य का परीक्षण करेगा।
विशेषज्ञ इन पहलुओं पर करेंगे विस्तृत अध्ययन
विशेषज्ञ नदी के जल प्रवाह, जल गुणवत्ता, मछलियों और जलीय जीवों की स्थिति, वनस्पति, वन्यजीव, भूस्खलन की संवेदनशीलता, स्थानीय अर्थव्यवस्था, पर्यटन और सामाजिक प्रभावों का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह भी देखा जाएगा कि नदी के किन हिस्सों में विकास गतिविधियों का दबाव अधिक है और किन क्षेत्रों को पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील मानकर विशेष संरक्षण की आवश्यकता है। ऊर्जा निदेशालय की देखरेख में यह अध्ययन होगा। मुख्य सचिव केके पंत ने बताया कि प्रदेश सरकार के निर्देश पर अध्ययन करने का फैसला लिया गया है। इसके लिए गुरुग्राम की कंपनी का चयन कर लिया गया है। रिपोर्ट के आधार पर आगामी रूपरेखा तय की जाएगी।
अध्ययन के तहत होंगे ये प्रमुख कार्य
अध्ययन के दौरान ब्यास नदी बेसिन से जुड़े पुराने शोध, तकनीकी रिपोर्टों और पर्यावरणीय अध्ययनों की समीक्षा की जाएगी। वर्तमान नीतियों, नियमों और पर्यावरणीय मानकों का विश्लेषण कर देखा जाएगा कि वे वर्तमान परिस्थितियों में कितने प्रभावी हैं। मौजूदा जलविद्युत परियोजनाओं के संयुक्त प्रभावों का मूल्यांकन किया जाएगा। अध्ययन में भविष्य के विभिन्न विकास परिदृश्यों का भी विश्लेषण होगा और यह देखा जाएगा कि यदि नई परियोजनाएं स्थापित होती हैं या वर्तमान क्षमता में विस्तार किया जाता है तो उसका पर्यावरण और समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
संवेदनशील क्षेत्रों की होगी पहचान
अध्ययन का उद्देश्य उन क्षेत्रों की पहचान करना भी है जो पर्यावरणीय या सामाजिक दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील हैं। इनमें दुर्लभ जैव विविधता वाले क्षेत्र, महत्वपूर्ण मत्स्य आवास, भूस्खलन संभावित क्षेत्र और स्थानीय समुदायों की आजीविका से जुड़े संवेदनशील इलाकों को चिह्नित किया जाएगा। इन क्षेत्रों के लिए विशेष संरक्षण रणनीतियां और विकास संबंधी दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे, ताकि भविष्य की परियोजनाएं पर्यावरणीय नुकसान को न्यूनतम रखते हुए आगे बढ़ सकें।
