
प्रशासनिक अधिकारियों पर मंत्री विक्रमादित्य सिंह के बयान पर सियासत और विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। मामले में अब एक पूर्व आईपीएस अधिकारी का बयान आया है। पूर्व डीआईजी विनोद धवन ने शनिवार को एक फेसबुक पोस्ट की। उन्होंने लिखा, ‘मुझे लगा कि हिमाचल में हाल ही में हुए घटनाक्रम पर अपने विचार रखना जरूरी है, जहां राज्य के दो बड़े ऑल इंडिया सर्विस एसोसिएशन ने प्रेस रिलीज जारी करके एक मंत्री के विचारों की निंदा की, जिसमें हमारे संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के तहत बोलने की आजादी के तहत अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन उस बात पर रिएक्शन देश की पहली सर्विस के हिसाब से सही और उपयुक्त नहीं था।’
उन्होंने आगे लिखा कि वह आईपीएस एसोसिएशन की ऐसी किसी भी बेवजह की बातों की निंदा करते हैं, जो न सिर्फ बेवजह थीं बल्कि इस देश की सबसे अच्छी आईपीएस सर्विस होने के नाते इसके संविधान और कानून के दायरे से बाहर थीं, जिससे इसकी सम्मान और शोहरत इतने बेकार स्तर तक गिर गई। जबकि संविधान के आर्टिकल और कानून के नियमों के तहत इसकी ज़िम्मेदारियां हैं और ये इस देश के किसी भी नागरिक को इस तरह के गैर कानूनी सामूहिक विचारों के आदान-प्रदान की इजाजत नहीं देतीं, जिसमें संविधान में अपने ही नागरिकों के लिए दिए गए अपने कर्तव्यों को पूरा न करने की धमकी दी गई हो, जो जेलों में बंद लोगों को भी मिले हुए हैं। जैसे कि जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए मौलिक अधिकारों की गारंटी।
धवन ने लिखा कि किसी भी सार्वजनिक भाषण पर कार्रवाई या प्रतिक्रिया करने से पहले, चाहे वह सही हो या गलत, क्या आईपीएस अधिकारियों ने एक नागरिक को इस तरह की धमकियों को मंजूरी देने की प्रक्रिया में शामिल थे, क्या इन अधिकारियों ने अपनी उपस्थिति में आईपीएस एसोसिएशनों में प्रस्ताव पारित करते समय एक स्वतंत्र विचार किया था कि क्या वे राष्ट्र के संविधान या कानून के किसी नियम के तहत ऐसे मुद्दे उत्पन्न करने के लिए सशक्त हैं। जैसा कि सार्वजनिक लिखित टिप्पणियों में किया जाता है। यह दर्शाता है कि सार्वजनिक सेवा में होने के बावजूद क्या इसे न्यायसंगत या विवेकपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि संगठन या राष्ट्र की सेवा करते हुए एक नागरिक के प्रति इस तरह की सेवा का दावा करना एक सामूहिक गलत पहल के रूप में, लिखित बयानों के रूप में खुले तौर पर सार्वजनिक रूप से किया जाता है, जो न केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के तहत गारंटीकृत अनुच्छेद का उल्लंघन करता है। जबकि पब्लिक डोमेन में इसके शर्मनाक, परेशान करने वाले और धमकी भरे लहजे ने खुद ब्रिटिश पुलिस के समय को याद दिलाता है कि एक बेहतरीन भारतीय पुलिस सर्विस, संविधान और कानून के राज का उल्लंघन करते हुए बोलने की आजादी को नीचा दिखाने के लिए इस तरह के गलत स्तर पर जा सकती है। कुल मिलाकर पुलिस अधिकारी कोई पवित्र गाय नहीं हैं जिसने उन्हें किसी भी नागरिक को संविधान द्वारा दी गई सेवाओं और कानून को वापस लेने की धमकी देने का मौका दिया जो राज्य की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई राजनीतिक कार्यकारिणी के अधीन भी हैं।
भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐसी नौटंकी कठिन परीक्षा की घड़ी हो सकती है, जहां अगर पुलिस प्रतिक्रिया करना शुरू कर दे या पुलिस संघों का दुरुपयोग करके, सार्वजनिक जीवन में पूर्वाग्रह के साथ इस तरह के बचकाने तरीके से प्रतिक्रिया दे। लोगों के मन में यह मनोविकृति पैदा हो गई है कि जब एक राज्य मंत्री को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जा सकता है, पुलिस सुरक्षा प्रदान नहीं की जा रही है तो आम नागरिकों का क्या होगा। इस अलोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह सही समय है कि हमारे सांविधानिक पिताओं को उल्लंघन के ऐसे गंभीर मामलों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। मजबूत और कठोर कानूनी तंत्र लाकर या ऐसे अनैतिक पुलिसिंग खतरों के लिए लिखित अधिकार क्षेत्र बनाकर, जहां कुछ शासकों के हाथों में खेलने वाले पुलिस अधिकारी सत्ता के पक्ष में नहीं बन सकते, राज्य के संचालन तंत्र को अधर्म और पूर्वाग्रह पर टिकाकर अस्थिर करके, जहां यह बुनियादी मौलिक अधिकारों की रक्षा के सांविधानिक दायित्वों को कमजोर करने के साथ कानून के शासन को सर्वोच्च बनाने की ओर इशारा करता है।
विनोद धवन ने कहा कि अगर कोई अथॉरिटी या संस्था तय नियमों के खिलाफ काम करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कार्रवाई होनी चाहिए। नागरिकों को चुप कराने के लिए अपनाए गए गैरकानूनी तरीकों से खतरा है। यहां आम नागरिक नहीं, बल्कि पॉलिटिकल एग्जीक्यूटिव इस ऑपरेशन का शिकार होते हैं। देश के बड़े संस्थान ऐसे ऑपरेशन का हथियार बन सकते हैं, जब उन्हें संविधान के तहत किसी कानून, किताब या आर्टिकल से अधिकार न मिले हों। अगर ऐसी किसी शिकायत से सर्विस एसोसिएशन को बुरा लगा हो, तो घटनाओं की जांच के लिए आवाज उठाई जा सकती थी। उन लोगों का पर्दाफाश किया जा सकता था जिनकी वजह से ऐसी मिली-जुली टिप्पणियों से राजनीतिक नौटंकी सामने आई और इसका जवाब पब्लिक डोमेन में आना चाहिए था। अगर कोई आग में पानी डालने की कोशिश करता है, तो धुआं कभी हवा में नहीं उठता। धवन ने सभी सर्विस ऑफिसर को सलाह दी कि वे खुद को पॉलिटिकल नौटंकी का हिस्सा न बनाएं, क्योंकि हमेशा वही लोग होते हैं जो बैकग्राउंड में बैठकर आग लगाते हैं। यह हिमाचल प्रदेश में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है।
वहीं प्रशासनिक अधिकारियों पर मंत्री की टिप्पणी के बाद गहराए विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने शुक्रवार को विक्रमादित्य सिंह को नसीहत दी कि वह अपने विभाग पर ध्यान दें। प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कार्यप्रणाली को और तेज करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सभी मंत्रियों को इस तरह की बयानबाजी नहीं करनी चाहिए। शुक्रवार को नई दिल्ली में मीडिया से बातचीत करते हुए सीएम ने कहा कि प्रदेश को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए सभी को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार ऐसे बयान ध्यान आकर्षित करने के लिए भी होते हैं। इस मुद्दे को बेवजह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। मेरे लिए ऐसी बातें कोई मायने नहीं रखती। उन्होंने कहा कि मंत्री और अधिकारियों के बीच किसी तरह का कोई विवाद नहीं है। प्रशासनिक कामकाज के दौरान कई बार मतभेद या विचारों में अंतर सामने आता है, लेकिन इसे विवाद का रूप देना सही नहीं है। ऐसी बातें पहले भी होती रही हैं, आगे भी होंगी, लेकिन इन पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। सभी अधिकारी निष्ठा और ईमानदारी से अपना दायित्व निभा रहे हैं। सरकार व प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल है और विकास कार्यों में कोई बाधा नहीं आ रही।
बता दें, प्रशासनिक अधिकारियों पर मंत्री विक्रमादित्य सिंह के बयान पर सत्तारूढ़ कांग्रेस में ही सियासत और गरमाई हुई है। कई मंत्री विक्रमादित्य के बयान को गलत करार दे रहे हैं, लेकिन अब शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर उनके समर्थन में खुल कर आ गए। शुक्रवार को शिमला में मीडिया से बातचीत में रोहित ठाकुर ने कहा कि दूसरे राज्यों के आईएएस अधिकारी ही नहीं, बल्कि राज्य काडर के भी कई अफसर नकरात्मक सोच वाले हैं। उन्होंने कहा कि विक्रमादित्य सिंह अनुभवी और काबिल मंत्री हैं, मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू को उनकी शंकाएं दूर करनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि मंत्री कोई बात सार्वजनिक तौर पर कह रहा है, तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय संवाद से सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने प्रदेश के विकास में दूसरे राज्यों से आए आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों के योगदान को भी सराहा। उन्होंने कहा कि जैसे हिमाचली अधिकारी दूसरे राज्यों में सेवाएं दे रहे हैं वैसे ही अन्य राज्यों के अधिकारी भी यहां पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी अधिकारियों को एक ही नजरिये से देखना या किसी एक बयान के आधार पर पूरे काडर को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। उन्होंने इस विवाद को कैबिनेट तक ले जाने की जरूरत से भी इन्कार किया। उन्होंने इसे परिवार का मामला बताते हुए कहा कि मुख्यमंत्री को सीधे हस्तक्षेप कर गलतफहमियां दूर करनी चाहिए। रोहित ठाकुर के समर्थन में आने से अलग-थलग हुए विक्रमादित्य सिंह को संबल मिला है। बीते दिनों इस विवाद को लेकर कैबिनेट मंत्री जगत सिंह नेगी, अनिरुद्ध सिंह और राजेश धर्माणी विक्रमादित्य सिंह को नसीहत दे चुके हैं।
