हिमाचल सरकार का बड़ा फैसला: रेप और मर्डर में सजा नहीं होगी कम, नई रिहाई नीति लागू

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हिमाचल प्रदेश सरकार ने जेलों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदियों की समयपूर्व रिहाई को लेकर संशोधित नीति और दिशा-निर्देश जारी किए हैं। खास बात यह है कि दुष्कर्म और हत्या के मामलों में सजा कम नहीं होगी। नई नीति के तहत कैदियों की रिहाई को पारदर्शी और नियमित प्रक्रिया से जोड़ने पर जोर दिया गया है। इसके तहत एक स्थायी राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (एसएसआरवी) गठित किया गया है। इसके अध्यक्ष अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) होंगे, जबकि विधि सचिव, उच्च न्यायालय की ओर से नामित जिला एवं सत्र न्यायाधीश और जेल महानिदेशक बोर्ड के सदस्य होंगे। बोर्ड प्रत्येक चार महीने में मामलों की समीक्षा करेगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर यह नीति जारी की गई है। सामान्य श्रेणी के कैदियों को कम से कम 14 वर्ष की वास्तविक कैद पूरी करनी होगी, जबकि कुल सजा (छूट सहित) 20 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।

हत्या के साथ बलात्कार, डकैती या आतंकी गतिविधियों जैसे अपराधों में दोषियों को कम से कम 20 वर्ष की वास्तविक कैद और छूट सहित 25 वर्ष की सजा पूरी करनी अनिवार्य होगी। महिला कैदियों के लिए जो धारा 475 बीएनएस के दायरे में नहीं आतीं, 7 वर्ष की वास्तविक कैद और छूट सहित 10 वर्ष की सजा के बाद पात्रता तय की गई है। रिहाई के समय कैदी को 10 हजार रुपये का निजी मुचलका और दो जमानतदार देने होंगे। साथ ही रिहाई के बाद एक वर्ष तक संबंधित पुलिस थाना में नियमित उपस्थिति दर्ज करानी होगी और बिना अनुमति जिला छोड़ने पर प्रतिबंध रहेगा।

दुष्कर्म सहित हत्या, डकैती सहित हत्या, नागरिक अधिकार अधिनियम 1955 के तहत अपराध से संबंधित हत्या, जेल में रहते हुए दोषसिद्धि के बाद की हत्या, पैरोल के दौरान हत्या, आतंकवादी घटना में हत्या, तस्करी अभियान में हत्या, ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक की हत्या जैसे जघन्य मामलों में आजीवन कारावास की सजा पाए दोषी। हत्याओं के लिए आजीवन कारावास की सजा पाए गैंगस्टर, सुपारी लेकर हत्या करने वाले, तस्कर, मादक पदार्थों के तस्कर, और अन्य अपराधी, पूर्व नियोजित और असाधारण हिंसा या विकृति के साथ की गई हत्याओं के अपराधी। जिन दोषियों की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया गया है।

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