शहरी निकाय चुनाव: सात दिन में अध्यक्ष के चयन की अनिवार्यता खत्म करने का मामला पहुंचा कोर्ट, सरकार को नोटिस

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हिमाचल प्रदेश के नगर निकाय चुनावों में जीत दर्ज करने वाले पार्षदों को सात दिन के भीतर शपथ नहीं दिलाए जाने और अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के चयन की अनिवार्यता खत्म करने का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार सहित अन्य विभागों को नोटिस जारी किया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की अदालत ने समय पर शपथ नहीं दिलाने को लेकर राज्य सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मंडी जिले की सुंदरनगर नगर परिषद से निर्वाचित पार्षदों राकेश चंचल (वार्ड नंबर 1), विजय कुमार (वार्ड नंबर 11) और लकेश कुमार (वार्ड नंबर 7) ने समयावधि में शपथ नहीं होने पर हिमाचल हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

इस याचिका में हिमाचल सरकार, राज्य चुनाव आयोग और शहरी विकास विभाग को पक्षकार बनाया गया है। मंगलवार को मामले की फिर सुनवाई तय हुई है।गौरतलब है कि राज्य सरकार ने हाल ही में पंचायतीराज एक्ट में संशोधन कर नगर निकाय, जिला परिषद और पंचायत समिति के चेयरमैन एवं वाइस चेयरमैन के चयन के लिए तय समय सीमा की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। अब उपायुक्त और एसडीएम अपनी सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार कभी भी बैठक बुलाकर इन पदों के लिए चुनाव करवा सकते हैं।

इससे पहले नियम यह था कि चुनाव परिणाम घोषित होने के सात दिन में नगर निकाय पार्षदों, जिला परिषद और बीडीसी सदस्यों की पहली बैठक बुलाना अनिवार्य होता था। बैठक में सदस्यों को शपथ दिलाने के बाद दो-तिहाई कोरम पूरा होने पर चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का चुनाव कराया जाता था। यदि पहली बैठक में सहमति नहीं बनती थी तो तीन दिन के भीतर दूसरी बैठक कर साधारण बहुमत से फैसला लिया जाता था। संशोधित प्रावधान में सात दिन के भीतर बैठक बुलाने की बाध्यता हटा दी गई थी। हालांकि कोरम और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अन्य नियम यथावत रखे गए हैं।हिमाचल में कत्था आधुनिक बॉयलर में बनेगा, हाईकोर्ट ने दी मंजूरी

 प्रदेश हाईकोर्ट ने पारंपरिक कत्था भट्ठियों को आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल आईबीआर बॉयलर प्रणाली में बदलने की मंजूरी देने वाले राज्य स्तरीय समिति के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने खैर की लकड़ी के इस्तेमाल पर लगी 7,500 कुंतल की सीमा को हटाने से भी इन्कार कर दिया है। अदालत ने उन कत्था निर्माताओं की याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जो अपने प्रतिस्पर्धियों को तकनीक अपग्रेड करने से रोकना चाहते थे और खैर की लकड़ी पर लगी इस्तेमाल की सीमा को हटाने की मांग कर रहे थे।

याचिकाकर्ता पहले से ही आधुनिक बॉयलर तकनीक का उपयोग कर रहे है। उन्होंने कोर्ट से सरकार की ओर से खैर की लकड़ी के उपयोग पर लगाई गई 7,500 कुंतल की अधिकतम सीमा को हटाने की मांग की थी। दूसरी अन्य पारंपरिक भट्ठी मालिकों (प्रतिद्वंदी व्यापारियों) को उनकी भट्ठियों को आधुनिक आईबीआर बॉयलर में बदलने की अनुमति देने वाले एसएलसी के फैसले और सरकारी अधिसूचना को रद्द करने की मांग उठाई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह प्रतिबंध उनके व्यापार करने के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19 (1) जी और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।अदालत ने याचिकाकर्ताओं के आचरण पर गंभीर रुख अपनाया

सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं के आचरण पर गंभीर रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि याचिकाकर्ता खुद तो आधुनिक तकनीक का लाभ ले रहे हैं, लेकिन जब उनके प्रतिस्पर्धी (छोटे व्यापारी) अपनी मशीनों को अपग्रेड करना चाहते हैं, तो वे इसका विरोध कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का असली मकसद खैर की लकड़ी का असीमित उपयोग कर बाजार पर अपना एकाधिकार जमाना है। अदालत ने कहा कि व्यापार करने का अधिकार जितना याचिकाकर्ताओं को है, उतना ही उन निजी प्रतिवादियों (छोटे व्यापारियों) को भी है, जो अपनी पुरानी भट्ठियों को सुधारना चाहते हैं।

अदालत ने राज्य सरकार के आंकड़ों और तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि पारंपरिक कत्था भट्ठियों में खैर की लकड़ी और वन संपदा की बर्बादी बहुत अधिक होती है। इसके विपरीत आईबीआर बॉयलर तकनीक से कम लकड़ी में अधिक कत्था निकलता है, प्रदूषण कम होता है और यह पर्यावरण के लिहाज से काफी सुरक्षित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक भट्ठियों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा रहा है। जो मालिक पुरानी व्यवस्था में रहना चाहते हैं, वे रह सकते हैं। लेकिन जो आधुनिक होना चाहते हैं, वे निर्धारित पंजीकरण और प्रोसेसिंग शुल्क जमा कर बदलाव के लिए आवेदन कर सकते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी याचिकाएं अनुकरणीय जुर्माने के साथ खारिज की जानी चाहिए, लेकिन अदालत ने एक उदार रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ताओं पर कोई जुर्माना नहीं लगाया और याचिकाओं को सीधे तौर पर खारिज कर दिया।

संसाधनों के समान वितरण पर दिया जोर

संसाधनों के समान वितरण पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने बाल गंगाधर तिलक के स्वराज, महात्मा गांधी के स्वशासन और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के सिद्धांतों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि ये सभी दर्शन समाज के अंतिम व्यक्ति तक काम और अवसर पहुंचाने तथा संसाधनों के समान वितरण की वकालत करते हैं। टिकाऊ विकास का मतलब ही यही है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना सभी हितधारकों को समान अवसर मिलें।

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