सीनियर को जूनियर से कम वेतन देना कानूनन गलत, हाईकोर्ट ने वेतन विसंगति दूर करने के दिए आदेश

Spread the love

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वेतन विसंगति को लेकर स्पष्ट किया है कि किसी भी वरिष्ठ कर्मचारी को उसके कनिष्ठ से कम वेतन नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि भले ही वेतन का यह अंतर जूनियर कर्मचारी को मिले किसी अतिरिक्त इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) के कारण ही क्यों न हुआ हो। कानूनन इस विसंगति को दूर कर सीनियर का वेतन भी उसके बराबर किया जाना अनिवार्य है।

न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के वेतन की इस विसंगति को उस तारीख से सुधारा जाए, जब से यह उत्पन्न हुई थी। चूंकि याचिकाकर्ता अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए उनके बढ़े हुए वेतन के बकाये का भुगतान अगले तीन माह में किया जाए।यदि तय समय में भुगतान नहीं किया गया, तो विभाग को याचिका दायर करने की तिथि से 6 फीसदी वार्षिक ब्याज भी देना होगा। याचिकाकर्ता एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने कोर्ट को बताया कि वह अपने एक कनिष्ठ से वरिष्ठ हैं।

याचिकाकर्ता ने साल 1994 में अपनी पीएचडी की डिग्री पूरी की थी, जिसके लिए तत्कालीन 1996 के यूजीसी नियमों के तहत उन्हें दो अग्रिम इंक्रीमेंट दिए गए थे। दूसरी ओर उनके जूनियर सहकर्मी ने साल 2008 में पीएचडी की उपाधि हासिल की।उस समय लागू 2006 के नए यूजीसी नियमों के तहत जूनियर को तीन अग्रिम इंक्रीमेंट दे दिए गए। इस एक अतिरिक्त इंक्रीमेंट के कारण जूनियर का वेतन अपने सीनियर से अधिक हो गया।

सरकार ने दलील दी थी कि चूंकि जूनियर कर्मचारी ने बाद में उच्च योग्यता हासिल की और उसे तत्कालीन नियमों के तहत वैध रूप से तीन इंक्रीमेंट मिले। इसलिए इसे वेतन विसंगति नहीं माना जा सकता और सीनियर इसके आधार पर अपने वेतन को बढ़ाने की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने विभाग की इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए साफ किया कि जूनियर कर्मचारी ने सीनियर से कोई उच्च योग्यता हासिल नहीं की थी। दोनों के पास एक समान पीएचडी की डिग्री थी। यह अंतर सिर्फ अलग-अलग समय पर मिले इंक्रीमेंट की संख्या के कारण पैदा हुआ था।देश के किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान की डिग्री मान्य

हाईकोर्ट ने दूसरे राज्यों के संस्थानों से प्राप्त डिग्री को लेकर स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार सिर्फ इस आधार पर किसी उम्मीदवार को नौकरी देने से मना नहीं कर सकती कि उसका डिप्लोमा प्रदेश या यहां की एससीवीटी से मान्यता प्राप्त नहीं है।

अदालत ने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार के पास देश के किसी भी वैध और मान्यता प्राप्त संस्थानों से डिप्लोमा है, तो वह रोजगार के लिए पूरी तरह पात्र है। संविधान के अनुच्छेद 16 के तहत रोजगार के मामलों में देश के हर नागरिक को समान अवसर का अधिकार है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं को पंचकर्म मसाजर के पद के लिए नए सिरे से विचार करे।

याचिकाकर्ताओं ने यहां से हासिल किया था डिप्लोमा

यदि वे अन्य सभी योग्यताएं पूरी करते हैं, तो उन्हें नियुक्ति प्रदान की जाए। याचिकाकर्ताओं ने पैरामेडिकल काउंसिल (पंजाब) और तेजस्विनी केरल आयुर्वेद मल्टीस्पेशलिटी सेंटर मोहाली से आयुर्वेदिक नर्सिंग और पंचकर्म थेरेपिस्ट में डिप्लोमा हासिल किया था। याचिकाकर्ता पंचकर्म मसाजर की भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए थे। दस्तावेज सत्यापन के लिए बुलाए जाने के बाद भी उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया। जब उन्होंने इसका कारण पूछा, तो विभाग ने कहा कि भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2022 के तहत केवल वही डिप्लोमा मान्य हैं, जो हिमाचल प्रदेश सरकार या यहां के तकनीकी शिक्षा निदेशालय से मान्यता प्राप्त हों।

उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था

इसी फैसले के खिलाफ उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि हिमाचल में केवल दो ही संस्थानों राजीव गांधी सरकारी पीजी आयुर्वेदिक कॉलेज पपरोला, कांगड़ा और क्षेत्रीय आयुर्वेदिक अस्पताल छोटा शिमला को इस कोर्स के लिए मान्यता दी गई है। चूंकि याचिकाकर्ताओं का डिप्लोमा बाहरी राज्य का है, इसलिए वे इस पद के योग्य नहीं हैं। अदालत ने कहा कि सरकार का स्टैंड यह नहीं है कि याचिकाकर्ताओं के डिप्लोमा फर्जी हैं या वे किसी फर्जी संस्थान से पढ़े हैं। जब तक डिप्लोमा देश के किसी प्रामाणिक और संबंधित राज्य के शीर्ष निकाय द्वारा मान्यता प्राप्त संस्थान से जारी किया गया है, तब तक हिमाचल प्रदेश सरकार उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं कर सकती कि वह राज्य के भीतर से नहीं है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *