हिमाचल हाईकोर्ट: तय समय में जाति प्रमाणपत्र नहीं देने पर आरक्षित श्रेणी का लाभ नहीं

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आरक्षित वर्ग के तहत सरकारी नौकरी की चाह रखने वाली विवाहित महिला उम्मीदवारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है।अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार काउंसलिंग के समय या विभाग द्वारा दिए गए तय समय के भीतर यह प्रमाण पत्र जमा करने में विफल रहता है, तो उसे आरक्षित श्रेणी का लाभ नहीं दिया जा सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे में उम्मीदवार की दावेदारी सामान्य श्रेणी में मानी जाएगी।

अदालत ने कहा कि यह याचिकाकर्ता की अपनी चूक है कि उन्हें सामान्य श्रेणी का उम्मीदवार माना गया। आरक्षित वर्ग का लाभ उठाने के लिए आवेदन के समय और दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान वैध प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य शर्त है। यदि कोई विसंगति पाई भी जाती है, तो उसे काउंसलिंग के बाद दिए गए उचित समय के भीतर ठीक करना होता है। चूंकि याचिकाकर्ता ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहीं, इसलिए विभाग के फैसले में कोई कानूनी खामी नहीं है।

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि विवाहित महिला को आरक्षण का लाभ उठाने के लिए अपने पति के नाम का नहीं, बल्कि अपने पैतृक पक्ष का जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता ने जेबीटी शिक्षक के पद पर अनुबंध के आधार पर बैच-वाइज भर्ती के लिए अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत आवेदन किया था। 22 नवंबर 2023 को आयोजित काउंसलिंग के दौरान, उन्होंने अपने पति के नाम पर जारी अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया।

चयन समिति ने इस पर आपत्ति जताते हुए उन्हें अपने पिता के नाम का पैतृक जाति प्रमाण पत्र जमा करने के निर्देश दिए। हालांकि, विभाग द्वारा त्रुटि सुधारने का मौका दिए जाने के बावजूद, वह तय समय सीमा के भीतर पैतृक प्रमाण पत्र जमा नहीं कर सकीं।इसके परिणामस्वरूप, विभाग ने उनकी दावेदारी को अनुसूचित जाति के बजाय सामान्य श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया और कम अंक होने के कारण उन्हें चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। इसी फैसले को याचिकाकर्ता ने अदालत में चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने जो पैतृक जाति प्रमाण पत्र बाद में बनवाया था, वह 28 नवंबर 2023 की तारीख का था, जबकि काउंसलिंग 22 नवंबर 2023 को ही समाप्त हो चुकी थी। इससे यह साफ हो गया कि काउंसलिंग के दिन वह वैध दस्तावेज के बिना उपस्थित थी। याचिकाकर्ता का दावा था कि उन्होंने बाद में विभाग को यह सर्टिफिकेट सौंप दिया था। विभाग ने अपने जवाब में स्पष्ट कहा था कि बार-बार कहे जाने के बावजूद उम्मीदवार ने समय पर दस्तावेज जमा नहीं किए।

सीपीएफ के स्थान पर जीपीएफ का लाभ देने की मांग, याचिका खारिज

प्रदेश हाईकोर्ट ने केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) के एक सेवानिवृत्त शिक्षक की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अंशदायी भविष्य निधि (सीपीएफ) के स्थान पर सामान्य पेंशन योजना (जीपीएफ) का लाभ देने की मांग की थी।

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कोई अनपढ़ व्यक्ति नहीं है। सेवाकाल के दौरान हर महीने मिलने वाले वेतन बिलों, फॉर्म-16 और वार्षिक विवरणों से यह साफ था कि वे सीपीएफ योजना का हिस्सा थे और लाभ उठा रहे थे। सेवानिवृत्ति के लंबे समय बाद पेंशन योजना में शामिल होने की मांग करना पूरी तरह गलत है।
 

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल (सीएटी) और हाईकोर्ट दोनों के समक्ष यह बात छिपाई कि उन्होंने 1989 में स्वयं सीपीएफ में रहने का विकल्प फॉर्म भरा था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां तथ्यों को दबाया गया हो, याचिका भारी जुर्माने के साथ खारिज होने योग्य है, लेकिन याचिकाकर्ता के बुजुर्ग और सेवानिवृत्त होने के कारण कोर्ट ने उन पर जुर्माना लगाने से परहेज किया।

याचिकाकर्ता वर्ष 1983 में केंद्रीय विद्यालय संगठन में प्राथमिक शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए थे। उन्होंने अपनी सेवा के दौरान स्वयं अपनी मर्जी से सीपीएफ योजना को चुना था। वर्ष 1989 में विभाग द्वारा दिए गए एक अन्य विकल्प के दौरान भी उन्होंने इसी योजना में ही बने रहने का फैसला किया। इसके बाद, वह 31 दिसंबर 2014 को सेवानिवृत्त हो गए और उन्होंने अपनी मर्जी से सीपीएफ के तहत मिलने वाले सभी वित्तीय लाभों के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर भुगतान प्राप्त कर लिया।

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