
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा मामलों में अत्यधिक देरी से दायर की जाने वाली याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि एक लंबी अवधि बीत जाने के बाद प्रशासनिक या कानूनी रूप से तय हो चुकी वरिष्ठता और पदोन्नति को दोबारा बदलना न तो तर्कसंगत है और न ही कानूनन सही है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने यह आदेश तेज पाल की ओर से 2019 में दायर याचिका में दिया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उन्हें दिसंबर 1997 से सहायक अभियंता के पद पर पदोन्नत माना जाए, क्योंकि उस समय विभाग ने 10-प्वाइंट रोस्टर का सही पालन नहीं किया था। याचिका में सरकार के आदेश 27 मई 2011 को भी चुनौती दी गई थी, जिसके तहत विभाग ने उनके इस विलंबित आवेदन को खारिज कर दिया था।
अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को साल 2001 में सहायक अभियंता और साल 2009 में अधिशासी अभियंता के पद पर पदोन्नत किया गया था। इन दोनों पदोन्नतियों को चुपचाप स्वीकार करने के 10 साल बाद उन्होंने 1997 के रोस्टर का मुद्दा उठाया, जो पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने कहा कि 1997 से 2009 के बीच कई अन्य अधिकारियों को पदोन्नत किया गया और वरिष्ठता सूचियां फाइनल हो चुकी हैं। ऐसे में इतनी देरी से किए गए दावे को स्वीकार करने से कई अन्य लोगों के अधिकार प्रभावित होंगे, जो कानून की नजर में सही नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के अनुसार 1997 में रोस्टर का पालन नहीं हुआ था, तो उन्हें एक उचित समय के भीतर अदालत या संबंधित अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए था। इतने लंबे समय बाद स्थापित हो चुकी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त नहीं किया जा सकता।
दिव्यांगता अधिनियम के तहत अतिरिक्त पद बनाने का निर्देश नहीं दे सकता कोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि शुरुआत से दिव्यांग कोटे के तहत नौकरी पाने वाले कर्मचारी अपनी पसंद के स्टेशन पर ट्रांसफर के लिए सरकार को अतिरिक्त पद बनाने का निर्देश देने की मांग नहीं कर सकते। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 20(4) और उसके प्रावधान केवल उन कर्मचारियों पर लागू होते हैं, जो सेवा के दौरान दिव्यांगता का शिकार होते हैं। यह कानून उन पर लागू नहीं होता, जो शुरुआत से ही दिव्यांग कोटे के तहत भर्ती हुए हैं। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता जिला निरीक्षक (उच्च पद) है, जबकि रामपुर में केवल निरीक्षक का कार्यालय है।
कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को ऐसी जगह तैनात करने का आदेश नहीं दिया जा सकता, जहां उनके कैडर का पद ही अस्तित्व में न हो। अदालत ने कहा कि अधिनियम के तहत शुरुआत से दिव्यांग कोटे में नियुक्त व्यक्ति के समायोजन के लिए कोई अतिरिक्त पद बनाने का प्रावधान नहीं है। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता की गंभीर पारिवारिक और शारीरिक स्थिति को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि यदि याचिकाकर्ता किसी ऐसे स्टेशन के लिए अनुरोध करते हैं, जहां जिला निरीक्षक का पद पहले से उपलब्ध है, तो सरकार उनके आवेदन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करे।
याचिकाकर्ता शिशु पाल शत-प्रतिशत दृष्टिबाधित हैं और उनकी पत्नी भी 75 फीसदी दृष्टिबाधित हैं। वह सहकारिता विभाग में जिला निरीक्षक/जिला लेखा परीक्षा अधिकारी के पद पर शिमला में कार्यरत थे। उन्होंने भौगोलिक परिस्थितियों और पारिवारिक दिक्कतों का हवाला देते हुए रामपुर तबादले करने की मांग की थी। चूंकि रामपुर में उनके कैडर का पद खाली नहीं था, इसलिए उन्होंने अदालत से गुहार लगाई थी कि सरकार को आरपीडबलयूडी अधिनियम की धारा 20(4) के तहत वहां एक अतिरिक्त पद सृजित करने का आदेश दिया जाए।
त्रियुंड ट्रैक पर कचरा प्रबंधन के लिए क्या कदम उठाए, सरकार और अफसरों को नोटिस
प्रदेश हाईकोर्ट ने धर्मशाला के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मैक्लोडगंज के ऊपर स्थित त्रियुंड ट्रैक पर ट्रैकर्स और पर्यटकों की ओर से फैलाई जा रही गंदगी और कचरे को लेकर संज्ञान लिया है। अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछा है कि वहां कचरा प्रबंधन के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने अयान भारद्वाज की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान जारी किया। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष त्रियुंड की कुछ हालिया तस्वीरें पेश की गईं।
इन तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि पूरे ट्रैक और मुख्य स्थल पर कांच की बोतलें, रैपर्स और प्लास्टिक का कचरा भारी मात्रा में बिखरा पड़ा है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नोटिस जारी कर मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर जवाब तलब किया है। पहला, क्या प्रशासन के पास त्रियुंड जाने वाले ट्रैकर्स की ओर से फैलाए जाने वाले कचरे को इकट्ठा करने और उसे नीचे लाने का कोई ठोस तंत्र मौजूद है। दूसरा, त्रियुंड मार्ग और शीर्ष पर बिस्कुट, पानी की बोतलें और कोल्ड ड्रिंक्स बेचने वाले दुकानदारों के पास क्या ऐसा कोई सिस्टम है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि उनके यहां से खरीदे गए सामान का कचरा वापस नीचे लाया जाए। मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी, जिसमें प्रशासन को अपना जवाब दाखिल करना होगा।
