अध्ययन में खुलासा: पत्थर, डंडा, रॉड… जो मिला वही बना हथियार; हिमाचल के युवाओं में बढ़ रही हिंस्सा

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हिमाचल प्रदेश में हत्या के मामलों में सबसे अधिक निशाना 21 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवा बन रहे हैं। अधिकांश मामलों में डंडे, लाठी, लोहे की रॉड, पत्थर और अन्य कुंद हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। हत्या के मामलों में शिकार आधे से अधिक लोगों के शरीर में अल्कोहल की मौजूदगी भी पाई गई। यह खुलासा नेरचौक मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के अध्ययन में हुआ है। अध्ययन सहायक प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शर्मा के नेतृत्व में डॉ. कीर्ति परमार और डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने वर्ष 2021 से 2025 तक किया। शोधकर्ताओं ने संस्थान में हुए पोस्टमार्टम और पुलिस जांच अभिलेखों का विश्लेषण कर हत्या के मामलों के कारण, पैटर्न और परिस्थितियों का आकलन किया। पांच वर्षों में कुल 707 पोस्टमार्टम किए गए, जिनमें 31 मामले हत्या के थे। इनमें 20 पुरुष (64.52 फीसदी) और 11 महिलाएं (35.48 फीसदी) थीं। सबसे अधिक 12 मामले (38.71 फीसदी) 21 से 30 वर्ष आयु वर्ग के पाए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं में व्यक्तिगत विवाद और आवेश में होने वाले हिंसक झगड़े गंभीर रूप ले रहे हैं

रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ
रिपोर्ट के मुताबिक 17 मामलों (54.84 फीसदी) में सिर पर लगी गंभीर चोट मौत का प्रमुख कारण बनी। वहीं 23 मामलों (74.2 फीसदी) में हत्या के लिए कुंद हथियारों का इस्तेमाल किया गया। इन हथियारों में डंडा, लाठी, लोहे की रॉड, पत्थर, ईंट, हथौड़ा और लकड़ी के भारी टुकड़े जैसी वस्तुएं शामिल हैं। अन्य मामलों में धारदार हथियार, गला घोंटना और विषैले पदार्थों का इस्तेमाल हुआ। एक मामले में सायनाइड से हत्या की पुष्टि भी हुई। यह भी सामने आया कि 17 मृतकों (54.84 फीसदी) के शरीर में एथिल अल्कोहल मौजूद था।

अध्ययन हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड डायग्नोस्टिक रिसर्च में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार शराब कई मामलों में हिंसक विवादों को बढ़ाने वाला कारक हो सकती है, हालांकि इसे हत्या का प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता। यह निष्कर्ष निकाला है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में अधिकांश हत्याएं व्यक्तिगत रंजिश, पारिवारिक विवाद और आपसी संघर्ष के चलते होती हैं। ऐसे मामलों में आसपास उपलब्ध वस्तुओं को ही हथियार बना लिया जाता है। उनका मानना है कि क्षेत्रीय अपराध पैटर्न का वैज्ञानिक विश्लेषण पुलिस, फॉरेंसिक विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं को हिंसक अपराधों की रोकथाम के लिए अधिक प्रभावी रणनीति तैयार करने में मदद करेगा।

इस अध्ययन को करने में पांच साल लगे हैं। मेडिकल कॉलेज में पांच वर्षों में कुल 707 पोस्टमार्टम के मामले आए थे। इन पर यह शोध हुआ है। इसमें चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। हिमाचल प्रदेश के युवाओं में व्यक्तिगत विवाद और आवेश में होने वाले हिंसक झगड़े गंभीर रूप ले रहे हैं। अभिभावकों को अपने बच्चों के प्रति सतर्क रहने की जरूरत है। -अभिषेक शर्मा, सहायक प्रोफेसर, फॉरेंसिक मेडिसिन मेडिकल कॉलेज नेरचौक

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