
हिमाचल प्रदेश में नशे के दौरान इस्तेमाल होने वाली सुइयां और युवाओं में बढ़ता टैटू बनवाने का शौक हेपेटाइटिस के खतरे को बढ़ा रहा है। प्रदेश में 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे और किशोर भी हेपेटाइटिस से संक्रमित पाए जा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण नशा करने के लिए एक ही सुई का बार-बार इस्तेमाल और संक्रमित सुइयों का कई लोगों द्वारा साझा किया जाना है। इसके अलावा, टैटू बनवाना भी जोखिम से खाली नहीं है। कई स्थानों पर टैटू बनाते समय एक ही निडल का इस्तेमाल कई लोगों पर किया जाता है, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है। वहीं, संक्रमित रक्त, शरीर के तरल पदार्थों तथा मां से बच्चे में भी हेपेटाइटिस बी फैल सकता है।
प्रदेश के दुर्गम क्षेत्र काजा में हेपेटाइटिस बी और सी के मामलों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2015 से 2017 के बीच इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के विभिन्न विभागों द्वारा किए गए अध्ययन में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए थे। यह अध्ययन वर्ष 2025 में द नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुआ। अध्ययन के अनुसार उस समय काजा में हेपेटाइटिस बी और सी की संक्रमण दर 22.7 प्रतिशत थी, जो देश में सबसे अधिक बताई गई थी। इसके बाद उपचार, टीकाकरण और व्यापक जागरूकता अभियान चलाया गया। अब संक्रमण दर घटकर 0.3 प्रतिशत रह गई है। करीब 30 हजार की आबादी वाले काजा में वर्तमान में हेपेटाइटिस बी और सी के 98 मरीज हैं।
बरसात में बढ़ता है हेपेटाइटिस ए और ई का खतरा
हिमाचल प्रदेश में बरसात के मौसम में हेपेटाइटिस ए और ई के मामले बढ़ने की आशंका रहती है। वर्तमान में कुल्लू में हेपेटाइटिस ए के सबसे अधिक मामले सामने आ रहे हैं। पिछले दो सप्ताह में 70 से अधिक मरीज मिले हैं। हेपेटाइटिस ए और ई जलजनित रोग हैं, जो दूषित पानी और अस्वच्छ खानपान के कारण फैलते हैं। स्वास्थ्य विभाग इन दिनों सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को प्रत्येक सप्ताह एडवाइजरी जारी कर रहा है और लोगों को जागरूक करने के निर्देश दे रहा है, ताकि हेपेटाइटिस ए और ई के मामलों को रोका जा सके।
ऐसे करें बचाव
उबला हुआ या सुरक्षित रूप से उपचारित पानी पिएं। स्वच्छ भोजन करें और नियमित रूप से हाथ धोएं। हेपेटाइटिस बी का टीकाकरण करवाएं। सुरक्षित यौन संबंध अपनाएं।
रोगाणुरहित इंजेक्शन और जांचे हुए रक्त का ही उपयोग करें। हेपेटाइटिस सी से बचाव के लिए सुइयों को साझा करने से बचें तथा कीटाणुरहित चिकित्सा उपकरणों और जांचे हुए रक्त का ही प्रयोग सुनिश्चित करें।हेपेटाइटिस अक्सर शुरुआती चरणों में कोई लक्षण नहीं दिखाता, इसलिए कई लोगों को संक्रमण का पता ही नहीं चल पाता। समय पर जांच और उपचार से लीवर सिरोसिस तथा लीवर कैंसर जैसी गंभीर जटिलताओं से बचाव संभव है। स्वस्थ आदतें अपनाकर और जोखिम होने पर समय रहते जांच करवाकर हेपेटाइटिस के प्रसार को रोका जा सकता है। -डॉ. यशपाल रांटा, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, शिमला
