पहाड़ों की रानी शिमला से रूठी बर्फ… तीन दशक में 37 फीसदी घटा हिमपात, विभाग के आंकड़ों में खुलासा

Snowfall is getting angry with Shimla: 97 percent decline in 35 years, revealed in Meteorological Department d

बर्फीली फिजाओं के लिए देश-दुनिया में मशहूर पहाड़ों की रानी शिमला से बर्फबारी अब रूठ-सी गई है। साल 1990 से लेकर 2020 तक शिमला में बर्फबारी 37 फीसदी कम दर्ज की गई है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार साल 1990 से 2000 के बीच में शिमला में जहां औसतन 129.1 सेंटीमीटर बर्फ गिरी थी, वहीं साल 2010-2020 के दशक में यह 80.3 सेंटीमीटर रह गई। बीते तीन सीजन में यह आंकड़ा दहाई के अंक को भी नहीं छू पाया है। विशेषज्ञ शिमला शहर में हिमपात कम होने को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन, बढ़ती जनसंख्या व कम होते पेड़ों से जोड़कर देख रहे हैं। कम होती बर्फबारी से पर्यटन कारोबार और बागवानी पर भी विपरीत असर पड़ रहा है।

दशक दर दशक घटी बर्फबारी
शिमला में 1990-2000 के दशक में दिसंबर में 27.1, जनवरी में 49.2, फरवरी में 44.7 और मार्च में 8.1 सेंटीमीटर औसतन बर्फबारी दर्ज की गई थी। इस दशक में शिमला में औसत 129 सेंटीमीटर बर्फ गिरी। अगले दशक 2001-2010 में यह 47.9 फीसदी घटकर 67.2 सेंटीमीटर रह गई। इसके बाद लगातार गिरावट देखी जा रही है। 2011 से 2020 तक शिमला शहर में औसतन 80.3 सेंटीमीटर बर्फ गिरी। साल 2020-2021 में 67 सेंटीमीटर, 2021-2022 में 161.7 सेंटीमीटर बर्फबारी हुई। इस समयावधि में कोविड लॉकडाउन के कारण वाहनों का न चलना अच्छी बर्फबारी का कारण माना गया। साल 2022-23 में यह आंकड़ा महज 6 सेंटीमीटर तक सिमट गया। वर्ष 2023-2024 में 7 सेंटीमीटर व इस सीजन 2024-2025 में अभी तक मात्र 9.5 सेंटीमीटर बर्फ गिरी है। दिसंबर, जनवरी, फरवरी और मार्च को बर्फबारी का सीजन माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार ये हैं कम बर्फबारी के कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, शिमला में बर्फबारी में गिरावट के लिए जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते वाहन व कंकरीट के जंगल और पेड़ कटान जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1901 से 2023 के बीच हिमाचल के सतही तापमान में औसत 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। तापमान में वृद्धि बर्फबारी को सीधे-सीधे प्रभावित कर रही है। प्रशासन और लोगों को मिलकर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे। 

बढ़ती आबादी, वाहनों ने बिगाड़ा संतुलन
शहर की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। साल 1991 में शिमला की आबादी लगभग 1.2 लाख थी, इस साल इसकी 2.5 लाख से ज्यादा पहुंचने की संभावना है। 1990 में शहर में मात्र 10,000 वाहन थे, अब इनकी संख्या एक लाख से अधिक हो चुकी है। शहरीकरण और भवन निर्माण कार्य भी तेजी से बढ़े हैं। साल 1990 में शिमला में करीब 5,000 मकान थे, जो अब 25,000 हो चुके हैं। बढ़ते निर्माण कार्यों के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई है, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ा है। अध्ययन के अनुसार, 1980 से 2017 तक शिमला तहसील में वन क्षेत्र में महत्वपूर्ण कमी आई। 1980 में वन क्षेत्र 34,100 हेक्टेयर 81.58% था, जो 2017 में घटकर 25,400 हेक्टेयर 60.77% रह गया। कुल 8,700 हेक्टेयर 20.81% वन क्षेत्र नष्ट हुआ, जिसका मुख्य कारण शहरीकरण और कृषि विस्तार है।

बढ़ानी होगी हरियाली, कारोबार पर भी असर
शिमला के जंगलों में नए पौधरोपण कार्यक्रम सफल नहीं हो पाए हैं। नमी घटने और हरियाली में गिरावट से भी बर्फबारी में कमी आ रही है। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. विनीत जिस्टू ने बताया कि पिछले कुछ सालों में शिमला और आसपास कम होती हरियाली पर्यावरण चक्र को प्रभावित कर रही है। इतिहासकार एवं जीएसएस स्कूल संजौली के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. केसी शर्मा ने बताया कि 1990 के बाद से शिमला के आसपास पेड़ कम हो गए हैं और इमारतें ज्यादा। लक्कड़ बाजार व्यापार मंडल के अध्यक्ष अनिल गुप्ता ने बताया कि पहले सर्दियों में पर्यटकों का जमावड़ा होता था, अब हिमपात की कमी से दुकानों से भीड़ गायब हो गई है।

तापमान बढ़ने से मौसम चक्र में परिवर्तन हो रहा है। सतह का तापमान बढ़ने से बर्फ के अणु जमा नहीं हो पा रहे और सतह पर बारिश के रूप में पहुंच रहे हैं। आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि शिमला में लगातार बर्फबारी कम होती जा रही है।

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