
हिमाचल में सिंदूर (कुमकुम) की खेती का सफल प्रयोग हुआ है। सिरमौर के कोलर निवासी किसान गिरधारी लाल ने अपने खेत में 80 पौधों को तैयार किया है। गिरधारी लाल ने करीब तीन साल पहले 20 पौधे नेपाल के काठमांडू से लाए। यह प्रयोग सफल रहा। इसके बाद बीते वर्ष उन्होंने बगीचे में 60 और पौधे लगाए। अब उनके पास 80 पौधों का बगीचा तैयार हो गया है। बता दें कि सिंदूर के पौधे के लिए उप उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। सिंदूर के पौधे का एक औषधीय महत्व है, जिसका वानस्पतिक नाम बिक्सा ओरेलाना है। कई लोग इसे सिंदूरी, कपिला नामों से भी जानते हैं।
सुहागिन महिलाओं के साथ-साथ पूजा-पाठ में सिंदूर का विशेष महत्व है। हालांकि आधुनिक युग में रसायनिक सिंदूर का प्रचलन बढ़ रहा है, लेकिन प्राकृतिक सिंदूर का अपना महत्व है। एक किलोग्राम प्राकृतिक सिंदूर 10 हजार रुपये तक भी बिकता है। खास बात यह है कि सिंदूर के पौधे में तीन साल बाद फल और फूल आना शुरू हो जाते हैं और इसे जंगली जानवरों सहित पक्षियों और बंदरों आदि से भी कोई खतरा नहीं होता। जिन क्षेत्रों में जंगली जानवरों के डर से किसान खेती छोड़ रहे हैं, वहां यह लाभदायक हो सकता है। इतना ही नहीं औषधीय गुणों कि बात करें तो सिंदूर एंटीपायरेटिक, एंटीडायरल, एंटी डायबिटिक होने के अलावा इसका रस महत्वपूर्ण दवाइयां बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
ऐसे बनता है सिंदूर
नवंबर और दिसंबर के महीने में पौधे में फूल आते हैं। इसके बाद फूल के अंदर के बीज को पीसकर उस से रंग बनाया जाता है। इसी बीज को जब सूखा दिया जाता है तो उसका पाउडर बनाकर सिंदूर तैयार कर लिया जाता है। इससे लाल व केसरी दोनों तरह का सिंदूर तैयार किया जा सकता है।
नर्सरी में तीन साल पहले नेपाल के काठमांडू से 20 पौधे सिंदूर के लाए गए थे। जिन्होंने फल देना शुरू कर दिया है। अब 60 और पौधे लगाए गए हैं। अब उनके पास 80 पौधे हैं। उनका प्रयोग सफल रहा है।