शादीशुदा महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता नहीं, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने लिव-इन पार्टनर की ओर से शादीशुदा महिला की कस्टडी को लेकर दायर याचिका पर अहम फैसला दिया है। अदालत ने फैसले में साफ किया है कि एक विवाहित महिला और उसके प्रेमी के बीच के लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी संरक्षण नहीं दिया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एडल्ट्री (व्यभिचार) जैसे अवैध रिश्ते को न्यायिक मंजूरी नहीं मिल सकती। अदालत ने याचिकाकर्ता की ओर से शादीशुदा प्रेमिका की कस्टडी को लेकर दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को विचार योग्य न मानते हुए शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया।हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए ये कहा

हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि महिला कानूनी रूप से अपने पति के साथ रह रही है। याचिकाकर्ता और महिला के बीच का यह रिश्ता व्यभिचार की श्रेणी में आता है। अदालत ऐसे किसी भी रिश्ते को न्यायिक मान्यता या पवित्रता नहीं दे सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि जब महिला अपने पति के साथ रह रही है, तो कोर्ट उनके घरेलू मामले में दखल नहीं देगा। याचिकाकर्ता का दावा था कि वह महिला का करीबी दोस्त है। उसने अदालत को बताया कि उसे महिला से कई संदेश मिले हैं, जिनमें उसने अपने पति और सास से जान का खतरा होने की बात कही है। इसलिए उसे मुक्त कराया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान जब अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उसके महिला के साथ शारीरिक संबंध हैं, तो यह बात सामने आई कि दोनों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप है।विवाहित महिला के साथ बने व्यभिचारी रिश्ते को कानूनन सही नहीं ठहराया जा सकता

इसके समर्थन में उन्होंने 17 दिसंबर 2025 का एक कथित समझौता भी रिकॉर्ड पर रखा था। दूसरी ओर, महिला की शादी प्रतिवादी से हो चुकी है और इस शादी से उनका एक बच्चा भी है। महिला वर्तमान में अपने पति के साथ ही रह रही है। हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि महिला अपने कानूनी पति के साथ रह रही है। इसलिए अदालत के लिए पति-पत्नी के बीच के इस तरह के वैवाहिक मामलों में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। याचिका में शादीशुदा महिला की कस्टडी की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के समलैंगिक और लिव-इन पार्टनर्स से जुड़े एक पुराने फैसले का हवाला दिया था। हाईकोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह नियम अविवाहित जोड़ों के लिए था, शादीशुदा महिला पर यह लागू नहीं होता। अदालत ने कहा कि किसी भी विवाहित महिला के साथ बने व्यभिचारी रिश्ते को कानूनन सही नहीं ठहराया जा सकता है। 

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