
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और शासकीय सेवा नियमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य को नशा मुक्त बनाने का उद्देश्य कितना भी पवित्र और कड़ा क्यों न हो, लेकिन किसी भी सरकारी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करने के लिए कानून की उचित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने महानिदेशक के 12 जनवरी 2026 के आदेश को निरस्त करते हुए कर्मचारियों की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए सभी पुलिसकर्मियों को सेवा में बहाल करने के आदेश दिए हैं। हालांकि, अदालत ने कहा कि विभाग के हाथ पूरी तरह नहीं बांधे हैं।
फैसले के अंत में यह स्पष्ट किया गया है कि आदेश के रद्द होने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी पाक-साफ हो गए हैं। विभाग यदि चाहे, तो कानून के दायरे में रहकर, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए और उचित विभागीय जांच चलाकर इन कर्मचारियों के खिलाफ नए सिरे से कानूनी कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। अदालत ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की ओर से एनडीपीएस मामलों में संलिप्तता के आरोप में तीन पुलिसकर्मियों(एक इंस्पेक्टर और दो कांस्टेबलों) को सीधे नौकरी से निकालने के आदेश को पूरी तरह अवैध पाते हुए रद्द कर दिया है।
अदालत ने इस मामले में बेहद तीखी टिप्पणियां कीं
अदालत ने इस मामले में बेहद तीखी टिप्पणियां करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 311(2)(बी) किसी कर्मचारी को बिना जांच के बर्खास्त करने की शक्ति जरूर देता है, लेकिन यह एक असाधारण अपवाद है। सामान्य नियम यही है कि किसी भी शासकीय सेवक को हटाने से पहले पूरी विभागीय जांच होनी चाहिए। प्राधिकारी अपनी मर्जी, सनक या केवल परिकल्पनाओं के आधार पर जांच की प्रक्रिया को बंद नहीं कर सकते। अदालत ने केंद्र सरकार के 2022 के कार्यालय ज्ञापन और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय जांच को केवल तभी टाला जा सकता है जब आरोपी कर्मचारी गवाहों को डरा-धमका रहा हो, जिससे गवाही होना असंभव हो।
जांच अधिकारी या उसके परिवार को जान का खतरा पैदा कर दिया गया हो। चारों तरफ हिंसा या व्यापक अनुशासनहीनता का माहौल हो, जिससे जांच करना व्यावहारिक रूप से संभव न हो। लेकिन वर्तमान मामले में रिकॉर्ड पर ऐसा एक भी सबूत या सामग्री मौजूद नहीं है जो यह दर्शाए कि याचिकाकर्ताओं ने गवाहों या अधिकारियों को कोई धमकी दी थी। जांच को दरकिनार करने के लिए कोई गंभीर या असाधारण परिस्थिति मौजूद नहीं थी।यहां जानें पूरा मामला
इंस्पेक्टर नीरज कुमार अप्रैल 2001 में भर्ती हुए और 2016 में इंस्पेक्टर बने। 2021 में इनके खिलाफ भ्रष्टाचार और एनडीपीएस की धाराओं में मामले दर्ज हुए। विभाग ने जांच की और अप्रैल 2023 में इन्हें केवल दो साल के लिए वेतन वृद्धि रोकने का लघु दंड देकर बहाल कर दिया। वे तब से ड्यूटी कर रहे थे। लेकिन अचानक तीन साल बाद डीजीपी ने सीधे बर्खास्तगी का आदेश थमा दिया। कांस्टेबल रजत चंदेल और राहुल वर्मा के खिलाफ अगस्त 2024 में शिमला में एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ था। दोनों के खिलाफ विभागीय जांच और कोर्ट ट्रायल अभी चल ही रहे थे कि बीच में ही डीजीपी ने अंतिम फैसले का इंतजार किए बिना इन्हें नौकरी से निकाल दिया।सरकार की दलील खारिज: नशा मुक्ति का लक्ष्य सही,पर तरीका गलत
सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता ने दलील दी थी कि नशा तस्करी में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़े संदेश देने और राज्य को ड्रग फ्री बनाने के लिए डीजीपी ने यह सख्त कदम उठाया था। अदालत ने सरकार की इस चिंता और गंभीरता की सराहना तो की,लेकिन प्रशासनिक मनमानी पर फटकार लगाते हुए कहा कि हम विभाग की चिंता को समझते हैं। चाहे कुछ भी हो जाए, कानून का शासन सर्वोपरि है। यदि कानून के रक्षक ही बिना प्रक्रिया के सजा देने लगेंगे, तो न्याय की मूल भावना ही समाप्त हो जाएगी।
पहले से तय मानसिकता से लिया गया था फैसला
अदालत ने पाया कि पुलिस महानिदेशक द्वारा 12 जनवरी 2026 को जारी बर्खास्तगी आदेश ऐसा प्रतीत होता है तो प्राधिकारी ने पहले से ही मन बना लिया था कि उन्हें इन कर्मचारियों को निकालना है और फिर उस फैसले को सही ठहराने के लिए नियमों का मनमाना सहारा लिया गया, जो कि सत्ता का रंगीन प्रयोग है।
भुगतान न होने पर इंजीनियर-इन-चीफ को कोर्ट में पेश होने के आदेश
प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के बकाया (एरियर) का भुगतान करने में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस मामले को अब और टाला नहीं जा सकता। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने आदेश दिया है कि आगामी 20 जुलाई तक याचिकाकर्ता की पूरी राशि का भुगतान कर दिया जाए। यदि तय तारीख तक भुगतान नहीं हुआ, तो लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ को खुद अदालत में हाजिर होकर स्पष्टीकरण देना होगा।
मामले की सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता ने डलहौजी डिवीजन के अधिशासी अभियंता से 30 जून को मिली हिदायतों के आधार पर कोर्ट को सूचित किया कि याचिकाकर्ता के एरियर की गणना की जा चुकी है। इसके लिए 9,86,998 के बजट की मांग 27 फरवरी को ही एक पत्र के जरिये इंजीनियर-इन-चीफ कार्यालय से की गई थी। अदालत ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि जब बजट की मांग फरवरी महीने में ही की जा चुकी थी, तो इतने महीनों बाद भी भुगतान क्यों नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि जब मामला पिछले कई महीनों से लंबित है, तो इसमें अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी।
